ई-बुक पद्य साहित्य मुक्तक/दोहा

लाल नीति संग्रह : भाग -1

लेखनी  मत करियो कुंठित कलम, गाय मनुज यश गान। मानव  हित   में   लेखनी , वही     लेखनी   जान।।1।। राजनीति  राजनीति की कोठरी , कालिख से भरपूर। विरला ही कोई मिले, हो कालिख से दूर।।2।। चुनाव    आते    फूटता , जातिवाद नासूर। मतदाता को भ्रमित कर, करते चाहत पूर।।3।। अपराधी लड़े चुनाव, नहि निर्भय मतदान। […]

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मुक्तक

मानसून आगमन प्रकृति करने लगी नर्तन बरसने ज़ब लगे बादल l थिरकने तब लगा यह मन बरसने जब लगे बादल l हुई तपती धरा शीतल खिले तरु जल रहे थे जो, छिड़ी फिर तान झींगुर की बरसने ज़ब लगे बादल l 🌹🌹 उमंगे सिर उठाती भावनाओं की लहर उठती l महक मेंहंदी की भीनी कामानाओं […]

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मुक्तक

जिहादियों के समर्थन में जो भी खड़ा हो, क़ानून का शिकंजा पहले उस पर कसा हो। भाईचारे की बातें बस दिखावा, खोखली होती, हिन्द में हिन्दुत्व परचम, बस मानव बसा हो। हिन्द में हिन्दुत्व की अब बात हो, इस्लाम का इतिहास भी ज्ञात हो। सबका साथ विश्वास अच्छा लगे, हिन्दू के साथ न कहीं भी […]

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समाधान के दोहे

उलझन को सुलझाइए,लेकर सुलझे भाव। जिसके सँग है सादगी,रखता प्रखर प्रभाव।। उलझन है मन की दशा,नहीं समस्या मान। यह है दुर्बलता-दशा,आज हक़ीक़त जान।। मन को रख तू नित प्रबल,उलझन होगी दूर। जो रखता ईमान वह,नहीं खो सके नूर। उलझन उसको ही डसे,जो सच में डरपोक। कौन लगा सकता यहाँ,साहस पर तो रोक।। उलझन को ना […]

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मुक्तक

तीर्थ स्थल में या मंदिर मेंजो अश्लीलता दिखाएगा वह असभ्य अपने कर्मों का तुरत वहीं फल पाएगा संस्कार मर्यादा भूले झूल रहे हैं कामुक झूले दुर्गंधित करते समाज को समय सबक सिखलाएगा — डॉ./इं. मनोज श्रीवास्तव

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मुक्तक

-1- रात दिन के संतुलन से है प्रकृति शुभदा सदा उदित होते सोम सूरज हैं न विचलित एकदा बह रही सरिता सजीली सिंधु से मिलना उसे गूँजती वीणा सुरीली,विमल वाणी शारदा। -2- शुभ्रतम जीना अगर तो संतुलन अनिवार्य है अग्रसर हो कर्मपथ पर धर्म तेरा कार्य है दूसरों के छिद्र में क्यों डालता है अँगुलियाँ […]

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धर्म

जन्म से जो भी हैं हम, वह तो रहेंगे, निज धर्म की पहचान, सबसे कहेंगे। धर्म ने हमको सिखाया, क्यों जीयें हम, मानवता सर्वोपरि है, सदाचरण कहेंगे। कुरुक्षेत्र में श्री कृष्ण ने सबको बताया, कर्तव्य और अधिकार का मर्म बताया। आत्मा अजर अमर, शरीर उसको धारता, बुद्धि को साथ ले, कर्म का सार बताया। जो […]

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योग और व्यायाम

(1) करना नित व्यायाम,ज़िन्दगी मंगल गाती। कहता चोखी बात,मान यदि मन को भाती। जीवन में उत्थान,यही तो सब ही चाहें, करता जो है योग,जिंन्दगी सदा सुहाती।। (2) जीवन है संग्राम ,तनावों ने घेरा है। काया रहे स्वस्थ,खुशी का तब डेरा है। कहते वेद -पुराण,निरोगी रहना हरदम, जो योगों से दूर,हर्ष ने मुँह फेरा है।। (3) […]

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बिकता नहीं गुलाब

नफरत के बाजार में ,बिकता नही गुलाब ,यहां सभी देते रहे ,काँटों भरे जवाब। सच कहना आसान है ,पर उसमे है झोल ,कांटे जिस सच से चुभें,वह सच कभी न बोल। असफलता को देखकर,क्यों घबराता यार,ये तो शूल पड़ाव है,आगे फूल बहार। फूल तुझे जो चाहिए ,करना शूल क़ुबूल ,यह जीवन का सत्य है ,जग […]

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मुक्तक

अति विनम्रता हानिकारक, ज्ञानीजन यह कहते, दुष्टों की दुष्टता को, सदा सज्जन जन ही सहते। विनम्र बने वृक्ष नित फल देते, पत्थर सहने पड़ते, सदा विनम्रता हानिकारक, शास्त्र सदा यह कहते। झुकने की सीमा से ज़्यादा झुकना, बुज़दिली कहलाता, सच के विरोधी लोगों से समझौता, बुज़दिली कहलाता। सी ए ए- एन आर सी, किसान आन्दोलन […]