मुक्तक/दोहा

मुक्तक

खून  सने  हाथों  से मैं भी अगर रोटियाँ खा लेता। नोटों की बारिश हो जाती अगर भाट बन गा लेता। लाख सहा दुख मैंने लेकिन रखा आत्मा को जिंदा वरना थोड़े से ज़मीर के बदले सब कुछ पा लेता।। — डॉ अवधेश कुमार अवध

मुक्तक/दोहा

कितना बदल गया परिवेश

वेलेंटाइन  के  चक्कर  में  अजब- गजब है  वेश। पुलवामा  की   कुर्बानी   को  भूल   रहा है देश।। सही- गलत के मिश्रण से हर ओर बढ़ा है क्लेश। मन  को रँगना  छोड़  लगे  रँगने  सतरंगी  केश।। पछुवा  पवन  सदा झकझोरे संस्कृति होती शेष। सबके  अपने शब्दकोश, शब्दों के भाव विशेष।। कर्तव्यों  को  भूल  मनुज  हक के  देता […]

मुक्तक/दोहा

प्रेम पगे प्रश्न

नैन  कटारी  मार  मुझे  घायल  कर जाती हो बोलो। रातों  में    सपनों में आकर चैन चुराती हो बोलो। तेरी  यादों    की    झंकारों में धड़कन भी गैर हुई- पल पल पल तड़पाकर मुझको क्या तुम पाती हो बोलो? नैनों को हथियार बनाना तूने मुझे सिखाया है। चैन चुराना सिखलाकर तूने ही चोर बनाया […]

मुक्तक/दोहा

मुक्तक

“मुक्तक” व्यंग ढंग का हो अगर, तो करता बहुमान। कहने को यह बात है, पर करता पहचान। भागे भागे क्यों फिरे, अपने घर से आप- और दुहाई दे रहे, मान मुझे मेहमान।। बनी बनाई रोटियाँ, खाता आया पाक। अब क्या तोड़ेगा सखे, लकड़ी जल भइ खाक। जाति-पाति के नाम पर, चला रहा है राज- कहाँ […]

मुक्तक/दोहा

मुक्तक

“मुक्तक” नया सवेरा हो रहा, फिर क्यों मूर्छित फूल। कुछ रहस्य इसमें छुपा, मत करना फिर भूल। बासी खाना देखकर, क्यों ललचायें जीव- बुझ जाएगी चाँदनी, शूल समाहित मूल।। नित नव राह दिखा रहे, कुंठा में हैं लोग। बिना कर्म के चाहते, मिल जाए मन भोग। सही बात पर चीखते, झूठों के सरदार- समझ न […]

मुक्तक/दोहा

दो मुक्तक

नूतन वर्ष में अभिनव प्रयोग करके तो देखें, नई विधा नई दिशा की ओर भी चलकर तो देखें, जीवन बन जाएगा मंगलमय मधुमास, नई युक्तियों को जरा अपनाकर तो देखें! रंग बहुत-से देखे, बसंती मन भाया, रंगों का सरताज, बसंती मन भाया, वीर शहीदों ने भी पहना, चटक बसंती चोला, देश-प्रेम का रंग, बसंती मन […]

ब्लॉग/परिचर्चा मुक्तक/दोहा

काव्य-विधा मुक्तक की मुक्तता

आप लोग हमारे साथ हाइकु, क्षणिका, गीत, बाल गीत, कविता आदि के सफर में साथ चले हैं, आज मुक्तक की बारी है. आइए जानते हैं काव्य-विधा मुक्तक की मुक्तता, मुक्तक शब्द के अर्थ, परिभाषा के बारे में और देखते हैं मुक्तक के कुछ नायाब उदाहरण. सबसे पहले देखिए हमारा एक नया मुक्तक- ”मुट्ठी बांधे जग […]

मुक्तक/दोहा

बसन्त पंचमी-दोहा मुक्तक

भौरों का गुंजन मधुर, कोकिल गाती गीत पुष्प सजीले खिल उठे, चली सदन को शीत। स्वागत करते हैं सभी, आये हैं ऋतुराज। मन व्याकुल प्रियतम बिना, कब आओगे मीत। वीणा पुस्तक धारिणी, भरो हृदय संगीत ज्ञानदायिनी आपगा, करूँ ज्ञान से प्रीत। श्वेत वस्त्र शुभ धारिणी, दे दो माँ आशीष ज्ञान दीप उर में जले, जीवन […]

मुक्तक/दोहा

दोहे रमेश के बसंत पंचमी पर

मातु शारदे दीजिए, यही एक वरदान. दोहों पर मेरे करे, जग सारा अभिमान.. मातु शारदे को सुमिर, दोहे रचूँ अनंत. जीवन मे साहित्य का छाया रहे बसंत.. सरस्वती से हो गया, तब से रिश्ता खास. बुरे वक्त में जब घिरा, लक्ष्मी रही न पास.. आई है ऋतु प्रेम की, आया है ऋतुराज. बन बैठी है […]

मुक्तक/दोहा

तीन मुक्तक

मुट्ठी बांधे जग में आए थे हम, मोबाइल लेकर घूमते हैं, मुट्ठी में है जमाना सोचकर, तंज़ करते हुए झूमते हैं, अभिसार और अभिसारिका का जमाना शायद लद गया, प्रेमी-प्रेमिका की तस्वीर देखकर मोबाइल को चूमते हैं.   सूरज फीका लग रहा, कहता अब संभलो, प्रदूषण ने मुझको घेरा, आदत अपनी बदलो, वरना ऐसा दिन […]