मुक्तक/दोहा

अब

स्वार्थ, छल के पाश में जकड़े हुए हैं लोग अब अपने – अपने दंभ में , अकडे़ हुए हैं लोग अब चल पडे़ हैं लोग सारे, राह सच की छोड़कर के झूठ की ही राह को , पकडे़ हुए हैं लोग अब   तथ्य ये साबित हुआ , जब हो गए प्रयोग सारे आधुनिकताओं में […]

मुक्तक/दोहा

मुक्तक

मुक्तक जी करता है जी भर नाचूँ, जीवन में झनकार लिए। सारे गुण की भरी गागरी, हर पन का फनकार लिए। सभी वाद्य बजने को आतुर, आए कोई वादक तो- शहनाई वीणा औ डमरू, सुरभित स्वर संसार लिए।। महातम मिश्र, गौतम गोरखपुर

पद्य साहित्य मुक्तक/दोहा

तीन मुक्तक

तीन मुक्तक 01 आज देश की कई सीमायें असुरक्षा से मचलती हैं घायल हो रहा हिमालय शहीदों की संख्या बढ़ती है। देश के अन्दर कानाफूसी दोषारोपण में उलझे लोग समय बदला हम न बदले पीढ़ी आत्मा की न सुनती है।। 02 कभी इस सीमा कभी उस सीमा सैनिक कब तक खोयेंगे रोना था शत्रुपक्ष को […]

मुक्तक/दोहा

मुक्तक

आज गर्मी ने किया बेहाल है। कह कोरोना अब तेरा क्या हाल है। घूम आया विश्व में कुंहराम कर- देख भारत में रुकी वह चाल है।। सिर झुका कर जा जहाँ से आया था। रे कोरोना जा जहाँ तू जाया था। आदमी को आश्रय देता भारत है- चीन बौना है जगत भरमाया था।। — महातम […]

मुक्तक/दोहा

मुक्तक

गर जरूरी हो तभी घर से निकलना चहिये चलने वालों से सही दूरी भी रखना चहिए जाने मिल जाये कहां कोई कोरोना वाला आपके अपना एहतियात तो रखना चाहिए आग पीती चिमनियाँ जब धूँवा उगलती है दर्द के एहसास से ये भी पिघलती है जब कहीं होता सृजन कल कारखानो में तब वहीँ इस्पात से […]

मुक्तक/दोहा

खूबसरत आँखें

खूबसूरत झुकी पलकें तुम्हारी सीप लगती हैं किसी नीले समंदर की छोटी सी झील लगती है, न जाने क्यों तमन्ना है इनमे डूब जाने की बनारस के शिवालय का महकता दीप लगती हैं।। डॉ. शशिवल्लभ शर्मा

मुक्तक/दोहा

अनंत के दोहे

ज्ञानी उसको मानिए, समरुप करे प्रकाश जैसे चंदन वृक्ष से, चहुँ दिग फैले वास जग में नर वह बाँटता, जो है उसके पास मोरी से दुर्गंध है, चंदन करे सुवास रस्सी इतनी तानिए, कहीं न जाये टूट साधो उतनी देह को, प्राण न जाये छूट दोहन इतना कीजिए, लात न मारे गाय लात निसर्ग बड़ी […]

मुक्तक/दोहा

मुक्तक

है रूप दुर्गा का, रूप है ये काली का, दमकता मुख, मृगनयन मतवाली का। माँ की ममता है, प्रेयसी का प्यार भी, विलक्षण तेज, वीरांगना निराली का। — अ कीर्ति वर्द्धन

मुक्तक/दोहा

मुक्तक

सिर पर गठरी हाथ में बखरी और पाँव में छाले हैं। गया कमाने था सुख रोटी जी पानी के भी लाले हैं। पैदल चलना मर खप जाना यही भाग्य में है तेरे- पीस दिया तूने सोलह व्यंजन अब न बचे निवाले हैं।। रास्तों को छोड़कर जाता कहाँ है आदमी। बस तनिक विश्राम कर फिर चल […]