Category : मुक्तक/दोहा

  • हमने

    हमने

    हमनें आन, बान और शान लिखा है हमनें लहू का कतरा-कतरा प्राण लिखा है हमनें तप ,त्याग वैराग लिखा है हमनें बुद्धि बल और ज्ञान लिखा है  

  • “दोहा”

    “दोहा”

    विषय आज का मनचला, खेल खेल में खेल कहीं रातरानी खिली, कहीं खिली है वेल।।-1 सुंदर हैं तारे सभी, गुरु प्रकाश सम आप मंच मिताई साधुता, साधुवाद बिन ताप।।-2 कड़क रही है दामिनी, बादल सह इतराय...

  • “दोहा-मुक्तक”

    “दोहा-मुक्तक”

    घर की शोभा आप हैं, बाहर में बहुमान भवन सदन सुंदर लगे, जिह्वा मीठे गान धाम धाम में वास हो, सद आचरण निवास भक्ती भक्त शिवामयी, शक्ति गुणी सुजान॥-1 घर मंदिर की मूर्ति में, संस्कार का...

  • “क़ता”

    “क़ता”

    बह्र- 2221 2221 2221 212, काफ़िया-अते, रदीफ़- आर में हम भी आ नहीं पाए तिरे खिलते बहार में तुम भी तो नहीं आए मिरे फलते गुबार में इक पल को ठहर जाते कभी तुम भी पुकार...

  • “मुक्तक”

    “मुक्तक”

    नाच रही परियों की टोली, शरद पूनम की रात है। रंग विरंगे परिधानों में, सुंदर सी बारात है। मन करता है मैं भी नाचूँ, गाऊँ इनके साथ में- धवल चाँदनी खिली हुई है, सखी आपसी बात...

  • “साली रस की खान”

    “साली रस की खान”

    सम्बन्धों का है यहाँ, अजब-गजब संसार। घरवाली से भी अधिक, साली से है प्यार।। — अपनी बहनों से नहीं, करते प्यार-अपार। किन्तु सालियों से करें, प्यारभरी मनुहार।। — जीजा-साली का बहुत, होता नाता खास। जिनके साली...

  • “दोहा मुक्तक”

    “दोहा मुक्तक”

    भूषण आभूषण खिले, खिल रहे अलंकार। गहना इज्जत आबरू, विभूषित संस्कार। यदा कदा दिखती प्रभा, मर्यादा सम्मान- हरी घास उगती धरा, पुष्पित हरशृंगार॥-1 गहना हैं जी बेटियाँ, आभूषण परिवार। कुलभूषण के हाथ में, राखी का त्यौहार।...

  • मुक्तक – हौसला

    मुक्तक – हौसला

    रेत की दीवार पर महल बना सकता हूँ, बहते पानी पर लिख कर बता सकता हूँ। मेरे हौसलों का अहसास नही है तुमको, बिना पंख के भी उडकर दिखा सकता हूँ। — अ कीर्तिवर्धन

  • “दोहा मुक्तक”

    “दोहा मुक्तक”

    यह तो प्रति हुंकार है, नव दिन का संग्राम। रावण को मूर्छा हुई, मेघनाथ सुर धाम। मंदोदरी महान थी, किया अहं आगाह- कुंभकर्ण फिर सो गए, घर विभीषण राम॥-1 यह दिन दश इतिहास है, विजय पर्व...

  • वक़्त

    वक़्त

    वक़्त   जैसा   भी  हो  वैसा  ही  काट  लेता  हूँ ग़ैर  का  दर्द   भी  अक्सर  में  बाँट   लेता   हूँ ज़िन्दगी तुझसे ये फुर्सत कभी मिले न  मिले सुकूँ  के  लम्हों  को  ग़म...