Category : मुक्तक/दोहा

  • “मुक्तक”

    “मुक्तक”

    हिंदी सिर बिंदी सजी, सजा सितंबर माह। अपनी भाषा को मिला, संवैधानिक छाँह। चौदह तारिख खिल गया, दे दर्जा सम्मान- धूम-धाम से मन रहा, प्रिय त्यौहारी चाह॥-1 बहुत बधाई आप को, देशज मीठी बोल। सगरी भाषा बहन सम,...


  • “मुक्तक”

    “मुक्तक”

    शीर्षक — भाषा/बोली/वाणी/इत्यादि समानार्थक तुझे छोड़ न जाऊँ री सैयां न कर लफड़ा डोली में। क्या रखा है इस झोली में जो नहीं तेरी ठिठोली में। आज के दिन तूँ रोक ले आँसू नैन छुपा ले...


  • “मुक्तक”

    “मुक्तक”

    फिंगरटच ने कर दिया, दिन जीवन आसान। मोबाइल के स्क्रीन पर, दिखता सकल जहान। बिना रुकावट मान लो, खुल जाते हैं द्वार- चाहा अनचाहा सुलभ, लिखो नाम अंजान॥-1 बिकता है सब कुछ यहाँ, पर न मिले...


  • बहाना होती है

    बहाना होती है

    आँगन की रौनक बहाना होती है, भाई के जीवन की गहना होती है। नेह के धागों पर रंग दुआओं के, ले बाँधें कलाई जो बहाना होती है।। —प्रदीप कुमार तिवारी—

  •  “मुक्तक”

     “मुक्तक”

    मापनी- 2122 2122 2212 212 जिंदगी को बिन बताए कैसे मचल जाऊँगा। बंद हैं कमरे खुले बिन कैसे निकल जाऊँगा। द्वार के बाहर तेरे कोई हाथ भी दिखता नहीं- खोल दे आकर किवाड़ी कैसे फिसल जाऊँगा॥-1...

  • “दोहा”

    “दोहा”

    इंसानों के महल में, पलती ललक अनेक। खिले जहाँ इंसानियत, उगता वहीँ विवेक।। जैसी मन की भावना, वैसा उभरा चित्र। सुंदर छाया दे गया, खिला साहसी मित्र।। अटल दिखी इंसानियत, सुंदर मन व्यवहार। जीत लिया कवि...

  • मुक्तक

    मुक्तक

    भरे जो मेघ नैनों के, बरसना भी जरूरी था गिले शिकवे दिलों में थे, गरजना भी जरूरी था सहजता से मिले कुछ तो, कदर उसकी नहीं होती अहमियत एक दूजे की, समझना भी जरूरी था