मुक्तक/दोहा

बुलन्द अशआर

धूप का लश्कर बढ़ा जाता है छाँव का मन्ज़र लुटा जाता है रौशनी में कदर पैनापन आँख में सुइयाँ चुभा जाता है फूल-पत्तों पर लिखा कुदरत ने वो करिश्मा कब पढ़ा जाता है चहचहाते पंछियों के कलरव में प्यार का मौसम खिला जाता है पाठशाला बना यह जीवन आजकल नित नया पाठ है, भूख और […]

मुक्तक/दोहा

बुलन्द अशआर

हाय! दिलबर चुप न बैठो, राजे-दिल अब खोल दो बज़्मे-उल्फ़त में छिड़ा है, गुफ्तगूं का सिलसिला मीरो-ग़ालिब की ज़मीं पर, शेर जो मैंने कहे कहकशां सजने लगा और लुत्फ़े-महफ़िल आ गया सोच का इक दायरा है, उससे मैं कैसे उठूँ सालती तो है बहुत यादें, मगर मैं क्या करूँ ज़िंदगी है तेज़ रौ, बह जायेगा […]

मुक्तक/दोहा

दोहे : करती खूब कलोल

सावन की बौछार में, भीगा है संसार सखियाँ झूला झूलती,सुने मेघ मल्हार | सजधज सखियाँ आ रही,कर सोलह शृंगार, सावन की बौछार में, मने तीज त्यौहार | मचकाती झूले सदा, करती खूब कलोल, साजन आते याद है,सुन पक्षी के बोल | बूंद बूंद बरसा रही, कुदरत करे कलोल, सावन की बौछार में, भीगे खूब कपोल […]

मुक्तक/दोहा

बुलन्द अशआर

ज़िन्दगी हमको मिली है चन्द रोज़ मौज-मस्ती लाज़मी है चन्द रोज़ प्यार का मौसम जवाँ है दोस्तो प्यार की महफ़िल सजी है चन्द रोज़ काश! कि दर्द दवा बन जाये ग़म भी एक नशा बन जाये वक़्त तिरे पहलू में ठहरे तेरी एक अदा बन जाये तुझसे बेबाक हंसी लेकर इक मासूम ख़ुदा बन जाये […]

मुक्तक/दोहा

चौपाई=चन्द्र बदन

चौपाई = प्रत्येक चरण मे १६-१६ मात्राएँ चौपाई=चन्द्र बदन ==================== चन्द्र बदन मम लागत कैसे, जिमि माणिक फन विषधर जैसे/१ सावन मेघ घटा घनघोरा , विरहन मन चितवत चहुओरा/२ काम बान उरलागे कैसे, तपत भूमि ज्येष्ठ मे जैसे/३ कोकिल बोल काक सम लागे, बिनु प्रियतम जल कंटक लागे/४ अवनि भरे जल विपुल अपारा, जरत अनल […]

मुक्तक/दोहा

दोहा

दोहा पहले -तीसरे चरण में १३ मात्राएँ ,[6+4+1+2,/,3+3+4+1+2] दूसरे–चौथे चरण में ११ मात्राएँ[6+4+1//3+3+2+2+1] फूल बिना महिमा घटी, चंदन कहत, जलजात। आकुल मन रजनी चली , रवि शशि बिनु दिन-रात।। [1] मायामय जग को कहे, रवि सम्मुख अँधियार। कामी कंठ हरिगुन कहे, समझ समय सुविचार।। [२] मलयागिरि महिमा कहे , राज सकल गुण खानि। बहत पवन […]

मुक्तक/दोहा

रामाँ रहीम बन के…

झाँका है दूर नभ से रामाँ रहीम बन के निकला है आज चन्दा फिर सज के और संवर के भूलो गमो के नगमे जी भरके मुस्कुराओ कर लो इबादते तुम अरमान पूरे मन के ।  

मुक्तक/दोहा

दो मुक्तक

भ्रांतियों में जी रहा है आदमी जहर को यूँ पी रहा है आदमी फंस गया पाखंडियों के जाल में झूठ का क़ैदी रहा है आदमी   सत्य का पालक यहाँ कोई नहीं न्याय संरक्षक रहा कोई नहीं आम जन है भटकता संसार में मार्गदर्शक मिल रहा कोई नहीं   — विजय कुमार सिंघल

मुक्तक/दोहा

मुक्तक : मुहब्बत गुनगुनायेंगे

छुपा आगोश में अपने इबादत भूल जायेंगे हमारा साथ दो गर तुम मुहब्बत गुनगुनायेंगे न जाना भूल बैठे हम सितारों को बिछा पथ मे तुम्हारे दिल में घर हम इक मुहब्बत का बनायेंगे