Category : मुक्तक/दोहा

  • मुक्तक

    मुक्तक

    प्रियतम तेरी याद है आई बहुत दिनों के बाद मुझको सारी रात जगाई बहुत दिनों के बाद सर्द हवा आई मेरे दिल को छूकर चली गई लगा तेरा स्पर्श कराई बहुत दिनों के बाद


  • दो मुक्तक

    दो मुक्तक

    आ मेरी ग़ज़ल तुझे प्यार दूं नया साज दूं नया राग दूं तुम बंसी मेरी बन जाओ अपने स्वर तुम पर साध दूं दिल ये मेरा अब तुम्हारा हो गया जब से कश्चित इशारा हो गया...

  • मुक्तक : कृषक

    मुक्तक : कृषक

    हे कृषक तेरा पसीना लहू बनकर झूमता है, शक्ति , शौर्य, प्रेम से हर जिगर को चूमता है रात -दिन जो एक करता अन्नदाता है व्यथित तंगहाली जिंदगी में मौत से नित जूझता है — राजकिशोर...

  • मुक्तक

    मुक्तक

    रुठती वो रहीं मैं मनाता रहा दर्द के गीत मैं गुनगुनाता रहा मुस्कुराती रहीं वो बड़े दर्प से मैं तड़पता रहा छटपटाता रहा — अरुण निषाद

  • मुक्तक : नहीं देखा

    मुक्तक : नहीं देखा

      दिल में समाकर जिसने, गुलिस्ताँ  नहीं देखा हमसफ़र बन साथ चलते, बागवाँ नहीं देखा मंज़िलें देखी बहुत ,प्यार पर एतवार नहीं कब राह चलते मिल गये, आसमाँ नहीं देखा — राजकिशोर मिश्र [राज] १२/०५/२०१५ प्रस्तुत...


  • देखते-देखते—-

    देखते-देखते—-

    देखते-देखते नयनो के जरिए हृदय में महल बना लिया। बात करते-करते आवाज़ों के जरिए मुझे दिवाना बना दिया अब तक तुम्हारे अदाओं के रंग में ऐसा रंगीन हो गया हूँ मैं हमेशा के लिए मेरे ख्वाबों-ख्यालों...

  • साहित्यकार और समाज

    साहित्यकार और समाज

    साहित्यकार समाज का करता है अन्वेषण समाजिक अनुभवों का करता है विश्लेषण समाज से पायी बातों को लेखनी में समेटकर रचनात्मक रुप देकर करता समाज को अर्पण ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ साहित्यकार संस्कृति की बातें बताता है समाजिक बातों...