Category : मुक्तक/दोहा

  • अन्न की बर्बादी  ?

    अन्न की बर्बादी ?

    बहुत हैं ऐसे जो ,एक रोटी के लिए तरसते हैं थाली भर लेते हैं कुछ,आधा खाकर छोड़ देते हैं जिम्मेदार हैं वे खुद, इस देश के अन्न की बर्बादी के नासमझी में बर्बाद कर अन्न,औरों को...

  • मुक्तक

    मुक्तक

    बहुत खा ली खटाई अब मुझे अच्छी नहीं लगती। कि चीनी बिन मिठाई अब मुझे अच्छी नहीं लगती।। कि नेताजी को गद्दी की पड़ी आदत सुनो जबसे। सभाओं में चटाई अब मुझे अच्छी नहीं लगती।। —...

  • अमन चाँदपुरी के पचास दोहे

    अमन चाँदपुरी के पचास दोहे

    हे! विधना तूने किया, ये कैसा इंसाफ। निर्दोषों को है सजा, पापी होते माफ।1। कैसे देखें बेटियाँ, बाहर का परिवेश। घर में रहते हुए भी, हुआ पराया देश।2। दोहे संत कबीर के, तन-मन लेय उतार। मानस...

  • बुलन्द अशआर

    बुलन्द अशआर

    ज़िंदगी से मौत बोली, ख़ाक हस्ती एक दिन जिस्म को रह जायँगी, रूहें तरसती एक दिन मौत ही इक चीज़ है, कॉमन सभी में दोस्तो देखिये क्या सरबलन्दी और पस्ती एक दिन रोज़ बनता और बिगड़ता...

  • बुलन्द अशआर

    बुलन्द अशआर

    धूप का लश्कर बढ़ा जाता है छाँव का मन्ज़र लुटा जाता है रौशनी में कदर पैनापन आँख में सुइयाँ चुभा जाता है फूल-पत्तों पर लिखा कुदरत ने वो करिश्मा कब पढ़ा जाता है चहचहाते पंछियों के...

  • बुलन्द अशआर

    बुलन्द अशआर

    हाय! दिलबर चुप न बैठो, राजे-दिल अब खोल दो बज़्मे-उल्फ़त में छिड़ा है, गुफ्तगूं का सिलसिला मीरो-ग़ालिब की ज़मीं पर, शेर जो मैंने कहे कहकशां सजने लगा और लुत्फ़े-महफ़िल आ गया सोच का इक दायरा है,...


  • बुलन्द अशआर

    बुलन्द अशआर

    ज़िन्दगी हमको मिली है चन्द रोज़ मौज-मस्ती लाज़मी है चन्द रोज़ प्यार का मौसम जवाँ है दोस्तो प्यार की महफ़िल सजी है चन्द रोज़ काश! कि दर्द दवा बन जाये ग़म भी एक नशा बन जाये...

  • चौपाई=चन्द्र बदन

    चौपाई=चन्द्र बदन

    चौपाई = प्रत्येक चरण मे १६-१६ मात्राएँ चौपाई=चन्द्र बदन ==================== चन्द्र बदन मम लागत कैसे, जिमि माणिक फन विषधर जैसे/१ सावन मेघ घटा घनघोरा , विरहन मन चितवत चहुओरा/२ काम बान उरलागे कैसे, तपत भूमि ज्येष्ठ...

  • दोहा

    दोहा

    युग – युग से है प्रेम की, देखो ये ही रीत | मिल ही जाये सब उसे ,मन सच्ची हो प्रीत || — कामनी गुप्ता