Category : ग़ज़ल/गीतिका

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    लोगों में अपनेपन का अब भाव नहीं रहा। परिवार टूटने का यही कारण खास रहा।। मिलते नहीं बिना मतलब के यहाँ कोई। हर कोई रुपये पैसे का यहाँ दास रहा।। भाव नहीं तो मिठास कहाँ दिखेगी...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    खूब लूटा सियासत ने आदमी को। राज पाट लूटा सारा और जान भी।। कितने ही सुरा सुंदरी में हुए बर्बाद। कितनों ने छुप कर लूटी आन भी।। घमंड में चूर – चूर हुए ख्वाब सारे ।...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    ग़म  के’ सैलाब  पिया  करती है। ये  ज़मी  यूँ  ही’  जिया करती है।।   ज़िन्दगी  ख़्वाब दिखाती जो भी। कब  हक़ीकत में’ दिया करती है।।   बे-हिसी   तंज   ज़माने  भर  के। मुफ़लिसी  रोज लिया...

  • ग़ज़ल 2

    ग़ज़ल 2

    मौत मेरी तुम्हें खींचकर लाएगी तुम न चाहो तो भी रूलाएगी । खींच लिए पांव क्यों तूने राहे बीच साथ चल न पाने की कसक सताएगी मैं नहीं पर लगता है तुम ही दिले दास्तां जहां...

  • ग़ज़ल 1

    ग़ज़ल 1

    खाली पहाड को बर्फानी मत लिख , सूखी नदी को भरी पानी मत लिख । हम जो सह गये चुप चाप सब कुछ , उस को हमारी नादानी मत लिख । हो गया झूठ हमारा सच...

  • कवि और कलम

    कवि और कलम

    बारूद के ढेर पर बैठी दुनिया समझा कवि। नफरतें सब धुल जाएँ प्रेमगीत सुना कवि।। जंग की तैयारी में बन रहे हथियार नये नये। जग से हथियार छुड़ा ,सौहार्द पकड़ा कवि।। क्यूँ अधीर हुए बैठी है...


  • ग़ज़ल : नये दौर की कहानी

    ग़ज़ल : नये दौर की कहानी

    जहरीली हवा घुटती जिंदगानी दोस्तों। यही है नये दौर की कहानी दोस्तों।। पर्वतों पे देखो कितने बाँध बन गये। जवां नदी की गुम हुई रवानी दोस्तों।। विज्ञानं की तरक्कियों ने चिड़ियाँ मार दीं। अब भोर चहकती...