Category : ग़ज़ल/गीतिका

  • ग़ज़ल : ये कैसा शहर है…

    ग़ज़ल : ये कैसा शहर है…

    सन्नाटों में हैं चींखें ,लुट जाने का डर है बताओ तो मेरे दोस्तों ये कैसा शहर है चारों तरफ हाहाकार चारों तरफ चीत्कार है मेरे अधूरे सपनो का ये कैसा नगर है कभी खुशियाँ अपार तो...

  • मेरी माँ ने

    मेरी माँ ने

    मेरी माँ ने झूठ बोल के आंसू छिपा लिया भूखी रह के भी, भरे पेट का बहाना बना लिया. सर पे उठा के बोझा जब थक गई थी वो इक घूंट पानी पीके अपना ग़म दबा...


  • अपनी ही अंजुमन में…

    अपनी ही अंजुमन में…

    अपनी ही अंजुमन में मैं अंजाना सा लगूं बिता हुआ इस दुनिया में फ़साना सा लगूं.   गाया है मुझको सबने, सबने भुला दिया ऐसा ही इक गुजरा हुआ तराना सा लगूं.   अपने ही हमनशीनों...

  • सबकी ऐसे गुजर गयी

    सबकी ऐसे गुजर गयी

    हिन्दू देखे, मुस्लिम देखे, इन्सां देख नहीं पाया मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे में, आते जाते उमर गयी अपना अपना राग लिये सब अपने अपने घेरे में हर इन्सां की एक कहानी, सबकी ऐसे गुजर गयी अपना हिस्सा...

  • रंग बदलती दुनिया देखी

    रंग बदलती दुनिया देखी

      सपनीली दुनिया मेँ यारो सपने खूब मचलते देखे रंग बदलती दुनिया देखी , खुद को रंग बदलते देखा सुविधाभोगी को तो मैंने एक जगह पर जमते देख़ा भूखों और गरीबोँ को तो दर दर मैंने चलते देखा...