Category : पद्य साहित्य

  • सघन नीरवता

    सघन नीरवता

      तुम्हारी चेतना के ध्यान कक्ष में मेरी सघन नीरवता की है गूँज तुम्हारे मन की आँखों के समक्ष कभी साये सा आ जाता हूँ सशरीर धरकर अपना रूप कभी कौँध जाता हूँ तड़ित सा एकाएक...

  • बुखार

    वर्षों से लागे है जैसे इमाम के ईमान को आ रहा बुखार अब मियादी हो चला दिल -दिमाग से चलो दें इसे बुहार मालिक को काटे है गैरों के तलवे चाटे है यह भले समाज में...

  • हाइकू

    हाइकू

      पोथि पुराण अनुभव का ज्ञान मार्गदर्शक मन आंगन वचन संजीवन नव सृजन कोरा कागज कलम स्याही भरी सजता लेख



  • सावन की घटा

    सावन की घटा

      मेरे ह्रदय की जमुना की धारा का तुम्हारे ह्रदय की पावन गंगा की धारा में हो जाए विलय जाते जाते सावन की घटा कह रही यह सविनय मुझ मधुप के तृषित अधरों का तुम्हारे अधरों...

  • महादान-छंदमुक्त कविता

    महादान-छंदमुक्त कविता

    महादान रखना था वचन का मान दिव्य उपहार कवच कुण्डल का कर्ण ने दे दिया दान| लोक हित का रखा ध्यान दधिची ने दिया अस्थि दान शस्त्र का हुआ निर्माण हरे गए असुरों के प्राण| अनोखे...



  • एक हाइकु

    प्राचीन समय में पुरुष अपनी पसंद की स्त्री का हाथ मांगते समय उसके पिता को तोहफे उपहार स्वरूप में देता था, ससुराल पक्ष न तो कोई मांग रखता था न ही दहेज़ को अपनी संपत्ति कह...