Category : पद्य साहित्य

  • वक़्त

    वक़्त

    वक़्त मुझको मैं वक़्त को गुजारता ही गया आईने में खुद को ऐसे उतारता ही गया मेरी आँखों से हटा जो भरम का परदा यारो टूटकर बिखरे हुए मैं ख्वाब सवारता ही गया   मेरी साखों...

  • ग्लेशियर का दर्द

    ग्लेशियर का दर्द

    ग्लेशियर को कहते हैं वो बढ़ाता है मान घाटियों का फिर नदी का फिर समुद्र का पर क्या कभी किसी ने पूछा है उससे क्या-२ गुजरती है उस पर जब चलता है वो पग-पग धीरे-धीरे पिघलता...

  • कविता : कागज

    कविता : कागज

    वो पुर्जे जो कागज़ के हैं भीग गए किसी की याद के टूटे किस्से थे वो मेरे दिल के टुकड़े थे शायद शायद वो जिंदगी के हिस्से थे आज उन किस्सों को दफनाकर वो मेरे दिल...

  • कुंडलियाँ

    कुंडलियाँ

    १ कठिनाई के सामने, झुके न जिनके माथ। जोड़े हैं उनको सदा, क़िस्मत ने भी हाथ।। क़िस्मत ने भी हाथ, बढ़ाकर दिया सहारा मंज़िल ने ख़ुद राह, दिखाकर उन्हें पुकारा खिले ख़ुशी के फूल, सरस बगिया...

  • दर्द की गठरी

    हां मैने सोचा था कि फिर आऊंगी लौटकर तुम्हारे पास कुछ नए दर्द लेकर …. !! पर जब तक जुदा रही तुमसे बहुत से दर्द गहरे अंतस तक उतर आए,.. औरजब तुमसे मिलने आने के लिए...

  • गांव

    गांव

    अक्सर ख्वाब में घर का कुवाँ नजर आता है आजकल मुझे मेरा गांव याद बहुत आता है याद आतें हैँ खेत खलिहान औ चौबारा बरसों बीत गये जहाँ पहुँच न पाये दुबारा याद आता है बरगद...


  • प्यार

    प्यार

    एक हम हैं जो उनसे खुद से भी ज्यादा प्यार जताते है वो हों या न हों मगर उनको अपने अहसासों में हमेशा अपने पास पाते हैं जानते हैं हम की उन्हें क्या अच्छा लगता है...

  • ग़ज़ल : सिलसिला

    ग़ज़ल : सिलसिला

      हर सुबह रंगीन अपनी शाम हर मदहोश है वक़्त की रंगीनियों का चल रहा है सिलसिला चार पल की जिंदगी में, मिल गयी सदियों की दौलत जब मिल गयी नजरें हमारी, दिल से दिल अपना...

  • हनुमान का लंका गमन

    हनुमान का लंका गमन

    विपदा के बादल थे छाये, वानर सागर के तट आये विस्तृत सिन्धु था भव्य अपार, शत योजन जिसका विस्तार वानर हारे से बैठ गए, मारे मारे से बैठ गए हरी के काम से भटके हैं, किन्तु...