कविता

आखिर पिता ही सब कुछ है

पिता जी है तो सब कुछ है, अगर घर है हमारे पास | वो सब है पिता जी की, धन-संपत्ति भी पिता की देन है ||               आखिर पिता ही सब कुछ है……………….. पिता है तो मान-सम्मान है, पिता है तो सब कोई अपने है| उनके बिना सब सपना […]

कविता

प्यार का मौसम

बात ही बात में चाँदनी रात में चल पड़े जिधर कदम जन्नत है वहीं सनम बादलों की इस गाँव में तारों की छॉव में खाई है जीने मरने की कसम आई प्यार की है मौसम घर है ना द्वार है बस तेरा ही प्यार है जी लेगें ये जीवन हम झेल कर सारे गम फूल […]

कविता

बसंत

बसंत आगमन की महक फिजा में महकने लगती है, ठंड की विदाई ,नव कोंपलों से हरे भरे पेड़ संवरने लगती है चहुंओर छा जाती हरियाली फूलों की रंगीनियां रंग बिरंगे फूलों की छटा कलकल करती नदियां, पक्षियों की चहचहाहट आनंद का सुखद अहसास चंद्र की मनमोहक चांदनी स्वच्छ निर्मल आकाश तरोताजा करती हवाएं पकती फसलें, […]

कविता

हिंदी भाषा

संस्कृत भाषा से जो जन्मी है संपूर्ण विश्व में जानी जाती है सर्व प्रिय मान सम्मान है जिसका हिंदी भाषा है नाम उसी का प्रेम के धागे में  बंधी हुई है हर भाषा में समाई है। एकता की जान है हिंदी अपने देश की शान है हिंदी। जगत में जिस दिन आए हम कर्णों ने […]

कविता

तुम ही मेरे गीत हो

तुम मेरे गीत हो, मैं तुम्हारा स्वर हूँ। मेरे जीवन का तुमने अर्थ दिया अब तक मैं बिना अर्थ का था। मेरे जीवन में कितना कोलाहल था अब उर में कलरव तेरी पायल। तुम चंचल सी तितली हो प्रिय फूलों की डाली पर मंडराती हो। मेरे जीवन में मधुरस घोल दिया है इस जीवन को […]

कविता

कैसे भूलूं तुझे ए मां

छुटपन में आता न था खाना न ही चलना और बैठना पैदा हुए तो एहसास न था जीने का आगाज न था तूने ही संभाला था तूने ही संवारा था बड़े होने की व्यथा बड़ी सज़ा  बड़ी कड़ी थी दुःख की तपती धूप थी तब तुम ही तो छांव  शीत थी लिखी थी किस्मत रब […]

कविता

पतझड़

गिरते पत्तों को देख निराश क्यों होते हो यह तो पतझड़ है नियति का लेखा है ऋतु आयेगी ऋतु जायेगी जो पतझड़ न होगा तो बसंत कैसे आएगा एक जायेगा तभी तो दूजा आएगा पुराना झड़ेगा नया खिलेगा यही तो प्रकृति है तू निराश क्यों होता है अंधेरे के बाद ही तो सवेरा होता है

कविता

शादी की सालगिरह

आइए! मुझे मुबारकबाद दीजिये मगर मुझे छोड़िये मेरी श्रीमती को ही यह उपहार दीजिये जिसनें मुझे झेला है, मेरी बात न कीजिये उसका जीवन जैसे नीम करेला है। शादी का लड्डू मुझे बहुत भाया पर श्रीमती जी का शुगर लेवल अचानक बहुत बढ़ गया, अब वो बेलन संग सिर पर सवार हैं, अपना शुगर लेवल […]

कविता

हिमालय दर्शन

आइए! हिमालय के दर्शन करता हूँ उसकी विशालता को नमन करता हूँ उससे कुछ सीख लेता हूँ, हिमालय के गुण सीख लेता हूँ। अटल, अडिग हिमालय निर्विकार भाव से संदेश देता है, न कोई भेद, न कोई विभेद सबको सम भाव से देखता, ऊँचा होकर भी गुमान नहीं करता कुछ न कुछ सबको देने का […]

कविता

जज्बात

चुनावों का मौसम क्या आया नेताओं को जनता के जज्बातों से खेलने का समय आ गया । सबके पिटारे से जाति धर्म ऊँच नीति के हिसाब के साथ अपने स्वार्थवश वादे निकल रहे हैं, निंदा नफरत, आरोप प्रत्यारोप के अनगढ़ दौर चल रहे हैं। जनता भी खूब बहकती है जज्बातों में जाति धर्म की हवा […]