कविता

दो जून की रोटी

सारा खेल है दो जून की रोटी का कोई दिन भर रहता परेशान है तोड़ता है हाड़ अपने इसको पाने की जुगत में कोई होटलों में जाकर बचा छोड़ देता है तश्तरी में इन्हें फैंकने को कूड़ेदान में देखो कैसा मुक्कदर है आदमी का कोई तरसता है इसे पाने को कोई खाके दो कौर छोड़ […]

कविता

शमशान घाट

मैं होकर निराश एक दिन पहुँच गया जिंदा ही शमशान घाट मैंने देखा – मुर्दे को जलते चिता पर चिता से निकलते धुँए को एक मानवीय देह को धीरे-धीरे राख में परिवर्तित होते हुए… जाति भेद, ऊँच नीच छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब पद-प्रतिष्ठा सब कुछ खत्म वाकी बची एक मुट्ठी राख वो भी उढ़ गई एक हवा […]

कविता

चंचल मन

ये   मन,  कितना    चंचल    है   यह    मन इसकी क्या बात करें, बड़ा  अनोखा है मन मीलों का  सफ़र पल  में तय  करता है मन जागती  आंखों  में  ख्वाब  सजाता  है  मन इस  पल  जो  पहुंचा  चांद   सितारों   तक तो   दूसरे   पल   वसुंधरा   के   गर्भ   तक डुबकियां लगाता है सागर की गहराइयों में […]

कविता

जब हाथ में रहे न बात

जब हाथ में रहे न बात तो वक़्त के हाथ छोड़ दे निशब्द हो बैठ जा कर इंतजार वक़्त का धुरी का पहिया घूमेगा जरूर नीचे से उपर आएगा जरूर आते ही ऊपर तू हो जा सवार वक़्त की बात तू मान ले जो भी लड़ा वक़्त से हार ही उसको मिली जो भी चला […]

कविता

तन्हाई

हर किसी के जिंदगी में तन्हाई होती है और उस तन्हाई में एक कहानी होती है सूखे पत्ते की तरह उड़ जाती है खुशियां गम की परछाई मन को घेर लेती है फासला कम होता नहीं तन्हाई से वास्ता बढ़ता ही जाता अकेलेपन से कभी हंसता तो कभी रोता है मन खुद ही खुद से […]

कविता

सच के करीब 6 कविताएँ

1. अच्छी बात सत्ता के 6 वर्ष ! अन्य देशों को मदद की गई, यह तो अच्छी बात है ! किन्तु मदद अपनी औकात देखकर ही होनी चाहिए ! चादर देखकर ही होनी चाहिए ! न कि अपने देश के नागरिक भूखा सोये और इलाज के लिए तड़पे ! देश की स्थिति अब भी नाजुक […]

कविता

थक हार गया हूँ

थक गया हूँ हार गया हूँ संघर्ष करते करते अपने आप से दुनिया से केवल अपने हक के लिए क्या हक मुझे मिल पायेगा? पता नहीं जवाब नहीं देती मेरी अपनी देह और मैं ढ़ेर सा महसूस करता हूँ आँगन में उफ़! हारी थकी साँसें गिनकर | अशोक बाबू माहौर

कविता

अब है संसार को रोना…….

अस्त्र शस्त्र सब धरे रह गये, कुछ भी काम न आया परग्रहों पर जाने वाला, घर से निकल न पाया हिरणाकष्यप अभिमानी भी, खुद को अमर मानता था कोई नरसिंह भी आयेगा, ऐसा नही वो जानता था प्रहलाद की उसने एक न मानी, अब अन्त समझ में आया अस्त्र शस्त्र सब धरे रह…….. कुदरत के […]

कविता

सदाबहार काव्यालय: तीसरा संकलन- 10

कैलाश भटनागर की दो कविताएं 1.लय मैं गूंगा नहीं हूं भावनाएं जब तीव्र हों देखा इतना गया हो सुना गया हो इतना कि बोलना कठिन हो तब सुनना नहीं, केवल देखना देखना-देखना-देखना. हां मैं देखता हूं हर चीज को ध्यान से बस देखता हूं मुझे चाहे दर्शक कहें या दार्शनिक पर मैं हूं वही मुझ […]

कविता

कभी तो

तुम ख्वाहिश हो मेरी कभी तो मुझे मिला करो। तुम दुआ हो मेरी कभी तो कबूल हुआ करो। तुम मोहब्बत हो मेरी कभी तो पूरी हुआ करो। तुम जहान हो मेरा कभी तो मुझ पर मर मिटा करो। तुम धड़कन हो मेरी कभी तो मेरे दहकते दिल में धड़का करो। तुम सांस हो मेरी कभी […]