कविता

अपना अनुभव

कभी सोचता हूं कि कुछ नया नायाब लिखूं जो भी अब तक लिखा सब पुराना पढ़ा पढ़ाया था पर क्या लिखूं सब तो सबको पता सुना सुनाया है फिर मेरे पास क्या है कहने को वहीं पुरानी घिसी पिटी बातों का दोहराव लोगों का कहा सुना नहीं नहीं यह कोई बात नहीं सोचना तुम्हारा है […]

कविता

हीरो बनाम विलेन

फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हॉट्सएप, ट्वीटर…. अपने आप में ‘कॅरोना’ वायरस हैं ! कोई मुकम्मल ‘हीरो’ नहीं होता, कोई मुकम्मल ‘विलेन’ नहीं होता ! ×××× ऐसे असंख्य लोग हैं, जो ‘कर्म ही पूजा’ से परे होकर कंदरा, हिमालय और पत्थर में भगवान ढूढ़ते हैं, जबकि माँ-बाप की सेवा ही कर्मफल है! ×××× देश के अंदर कई तरह […]

कविता

भाषा का डॉक्टर

भारत में धर्म की कोई कमी नहीं ! यहाँ लोगो को रोटी चाहिए  ! विवेकानंद कहिन । ×××× मज़हब वही सिखाता, आपस में वैर रखना; जिस ओर सर किसी का, उस ओर पैर रखना ! ×××× शिक्षक-संघ सरकार से रजिस्टर्ड हैं, जिनके आह्वान पर सदस्य-शिक्षक हड़ताल पर…. प्राथमिकी अगर हो तो संघ पर हो, शिक्षकों […]

कविता

राजनीति एक विधा है

एक और मगध सम्राट ‘नंद’ कुमार के साम्राज्य को ढहाने को ‘चाणक्य’ (नियोजित शिक्षक) ने चोटी खोल (हड़ताल का हड़कंप) दी है ! ×××× राजनीति वो विधा है, जो श्मशान व क़ब्रिस्तान में भी जीवन ढूढ़ते हैं ! ×××× 4 साल में एकबार आती है 29 फरवरी भारतरत्न और निशान -ए- पाकिस्तान व पूर्व PM […]

कविता

भ्रष्टाचार

अविश्वसनीय सा लगता है पर भ्रष्टाचार का दीमक हर ओर पहुँच ही जाता है, अब क्या क्या, कहाँ कहाँ बताऊँ अब तो कहते हुए भी शर्म लगता है। अब आप ही बताइये इसे क्या कहेंगे? अब तो लाशों के साथ भी भ्रष्टाचार होता है। कौन है जो दावा कर सके कि यहां भ्रष्टाचार नहीं होता […]

कविता

चिंतन बाल-कल्याण पर

बचपन सबका हँसकर बीते,यह ही बस चाहत है, नहीं रहे वंचित कोय बच्चा,यही मेरा अभिमत है। पालन-पोषण,शिक्षा,शैशव,सब कुछ अब मोहक हो, मिले वही हर बच्चे को जो,उसका समुचित हक़ हो। अधिकारों की बातें होतीं,सच लेकिन उल्टा है, झुग्गी के बच्चों का देखो,जीवन सब पल्टा है। नारे-वादे बहुत हो चुके,अब कुछ करना होगा, बच्चों के बचपन-जीवन […]

कविता

दीवाली का पर्व

हो उत्साहित खूब धूमधाम से इक बार,,, फिर से सभी ने है दीपावली का पर्व मनाया! जला के दीए और रौशनी की लड़ियां है… धरती से तम को भगाया !!   पर,,,, ज्वलंत प्रश्न है समक्ष हमारे, मन के भीतर क्यों? फैला है अंधेरा ! हममें से… है कितनों जनों ने भीतर के तम को […]

कविता

मां बनते ही हर महिला

  मां बनते ही हर महिला, जाति-विहीन हो जाती है! शूद्र-क्षेत्रीय-ब्राह्मण-वैश्य बन रोज़ाना नित नई भूमिका वो निभाती है!! पालन करते हुए शिशु का, परिचारिका वो बन जाती है! बच्चे की रक्षा की खातिर, क्षत्रिय वो हो जाती है!! देते हुए संस्कार बच्चे को ब्राह्मण की भूमिका निभाती है! बच्चे के लिए करती संचित धन […]

कविता

रिश्तों की उम्र लम्बी हो जाती है !!

आंकलन तेरा, तेरे बग़ैर तेरा जब भी किया सारी कमियों को, नजरअंदाज मन ने कर दिया बिना मेरे कहे ही सच तो यही है न, कि दिलों के रिश्तों में… दिमाग़ का दख़ल, न रखा जाये तो, रिश्तों की उम्र लम्बी हो जाती है।

कविता

वादा

चुनाव लड़ रहे एक प्रत्याशी ने अपने मतदाताओं से एक बार फिर निवेदन किया बस ! एकबार और मौका दीजिये, इस बार आप यकीन कीजिये इस बार मैं हमेशा आपके बीच रहूँगा, यहां नहीं तो लखनऊ, दिल्ली में जरूर मिलूंगा। फिर यदि वादे पर खरा न उतर सका तो अगली बार सिर्फ़ वोट की खातिर […]