कविता

यूँ तो शान्ति 

यूँ तो शान्ति किसे नहीं सुहाती फिर चाहे पशु-पक्षी हो या इंसान शान्ति का होता एक विज्ञान जो आरोग्य प्रदान करता तन का मन का जो साथ देता जन-जन का शान्ति घर की गली की गाँव-शहर की अद्भुत रस देती है शान्ति दो देशों की बहुत कुछ कहती है पर आज कोलाहल परवान पर है […]

कविता

बेटी

प्रेम पूजा रिश्तों का बीज होती है बेटी बड़े ही नाजों से घरों में पलती है बेटी बाबुल की हर बात को मानती है बेटी घर में माँ के संग हाथ बटाती है बेटी। छोटें भाइयों को डांटती समझाती है बेटी माता-पिता का दायित्व निभाती है बेटी संजा,रंगोली ,आरती को सजाती है बेटी घर में […]

कविता

न जाने कोई

क्या चलता किस के मन में जान नहीं सकता कोई कौन अपना कौन पराया बातों से पहचान सके नहीं कोई कब प्यार बदल जाए नफरत में जान नहीं सकता कोई कब कोई अनजाना आकर बन जाए मीत कोई किस घड़ी बदल जाए वक़्त नहीं जान सके कोई आकर चला जाएं कोई कब न जाने कोई

कविता

पल बदलते हैं

पल बदलते हैं , संवत बदलते हैं और मन्वंतर बदलते हैं इंसान वही रहता है खुद को खोजता हुआ बाहर सब विलक्षण है आकर्षक , सम्मोहक तृष्णा, मृगमरीचिकाओं को बढ़ाता है ‘मैं’ से नहीं जब पा सके हैं मुक्ति अब तक मोह, मन में सागर सा घहराता है कुछ तो बदलें पारंपरिक प्रवृत्तियों को ‘मैं’ […]

कविता

पत्नी

तेरा मिजाज़ भी बरसात सा है पता नहीं कब झमाझम बरस जाए और कब बरस कर निकल जाए कभी आंधी सी चल पड़े कभी मंद पड़ जाएं बहुत मुश्किल है समझना तुझको कब धूप कब छांव हो जाए *

कविता

मैं श्मशान हूँ

मैं श्मशान हूँ जलाती हूँ, चांदनी रात के सफेद उजियारा में दहकते शव जल रहे थे, नदी की मध्यम धारा में शांत धुन मद कर रहे थे, कुछ जला,कुछ अधजल सा कुछ राख हुये, कुछ के पूर्ण कुछ के सपने जलकर खाक हुये, मैं श्मशान हूं जलाती हूं, सिर्फ उस मिट्टी को जिनमे ममता,मोह और […]

कविता

बदलते रिश्ते

सच मानों तो  दिल की बातें, और  किसी  को  न  बताना। जख्म चाहे हो  जितने  गहरे, दिल  खोलकर  न  दिखाना। झूठी    दुनियां  , झूठे   रिश्ते, मोल    समझ    न     पाएंगे। रो      रोकर     यह     पूछेगे, हंस  कर   सबको   बताएंगे। दस   मुखौटे  पहन  कर  यह, अपना     तुमको     बताएंगे। […]

कविता

अवनी

अवनी की इस चादर में , बैठी रही दिन रात में। शान्ति ढूंढ रही थी में, वसुंधरा की लहरों में।। झूम रही गगन तले में, वसंत की मधुरिमा में। भँवरों की मधुशाला में, गुलाब की पंखुडियों में।। अम्बर के तले अचला में, प्रकृति की सीमाओं में। आशाओं की वेदना में , मन की तरू लताओं […]

कविता पद्य साहित्य सामाजिक

धूल-मिट्टी

पत्तों पर जमी धूल,चिपटी है उनसे जैसे चिपटा है विकास मानव सभ्यता से.. टूट-टूटकर मिट्टी बदल गयी है धूल में, ये वही मिट्टी है जो बांध लिया करती थी सबको सबसे और जीवन को जीवन से और गढ़ देती थी हम सब की दुनिया आकार देती थी पेड़-पौधों को माँ जैसे वो मिट्टी बस थोड़ी […]

कविता

मन्नै गुल्लक फोड़ी, कोई खबर नहीं !

विलासिता प्रदर्शित करनेवाले चीजों को व्यवहार करनेवालों को ‘पद्म अवार्ड’ नहीं मिलनी चाहिए, चाहे वो कोई भी हो ! ×××× अभी सांसत में है जान, फिर भी कहते- मैं हिन्दू, तू मुसलमान ! कोरोना से मिट रहे ये पहचान, तो क्यों न बने हम इंसान ! ×××× घर बैठे आविष्कार कीजिए, फिर पढ़ने की जरूरत […]