इतिहास कविता

आज वीरांगना लक्ष्मीबाई भी शहीद हुयी .(18 जून 1958 )

“खंजर की चमक खनक तलवार की  खौफ से जीता था दुश्मन सदा जिसके वार से  कांपते थे दिल ..डोलती थी सत्ता जिसके नाम से गुडिया नहीं भायी उसको चूड़िया न सुहाई वक्त को  शब्द जो बोलती थी तलवार से तौलती थी बंदूक भाला बरछी सखी दोस्त बन चले थे था घुड़सवारी शौक .. वीरबाना जिसका […]

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****पिता****

****पिता**** माँ का हर श्रृंगार पिता। बच्चों का संसार पिता।। माँ आँगन की तुलसी है। दर के वंदनवार पिता।। घर की नीव सरीखी माँ। घर की छत-दीवार पिता।। माँ कर्त्तव्य बताती है। देते है अधिकार पिता।। बच्चों की पालक है माँ। घर के पालनहार पिता।। माँ सपने बुनती रहती। करते है साकार पिता।। बच्चों की […]

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कुछ सपनें टूट गए तो क्या

कुछ सपनें टूट गए तो क्याकुछ अपने रूठ गए तो क्याजीवन के ……दुर्गम पथ परकुछ साथी छूट गए तो क्यासूरज तो फिर भी निकलेगानयी सुबह फिर भी आएगी फिर भोर करेगें पक्षी करलवफिर पवन सुगंध फैलाएगीयह अंधकार फिर भी हारेगा  कुछ तारे टूट गए तो क्या जीवन के ……दुर्गम पथ पर कुछ साथी छूट गए तो […]

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तुम…. बस पागल कर देती हो

नैन कमान के चितवन से …..बस घायल कर देती हो कैसे तुमको समझाऊँ तुम…. बस पागल कर देती होजन्मों से प्यासा था मैं, हलक में लार थी बची नहींप्यासे प्यासे कंठ में तुम, प्रिय गंगाजल भर देती होकैसे तुमको समझाऊँ तुम…. बस पागल कर देती हो चारो ओर था सन्नाटा, बस मायूसी सबका हांसिल थी जीवन […]

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मिस्ड काल

मिस्ड कॉल पड़ी स्मृति के किसी कोने जिनमें दर्ज हो सकती है किसी की शरारत किसी की भूल किसी की ज़रूरत किसी की आदत किसी की विपन्नता मिस्ड कॉल असंख्य बार उभर आते हैं मोबाइल स्क्रीन पर अथक कोशिश की अनंत वेदना कुछ परिचितों के कुछ अपरिचितों के जिनमे कई बार दर्ज होते हैं उनकी […]

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मेरा भांजा

छोटा सा मुखड़ा हँसती आँखें खिलती जुल्फें नटखट अदा से दे जाता अपनापन जीवन की लालसा जिजीविषा जगाता खुशियाँ बाँटता मुझे माँ कह पुकारता मुझमें कुछ भरता एक रोशनी दे जाता इस दुनिया में सच्चा रिश्ता बताता यह रिश्ता आज भी कल भी जीवन की सच्चाई दे जाता

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॥स्त्री बनने के बाद॥

जैसे दिया जूझता है हवा के झोंके से किसान लड़ता है टिड्डियों के हमले से बच्चा निपटाना चाहता है अपना होमवर्क सूरज तैरता है बादलों की नदी में उम्र के इस पड़ाव पर स्त्री जूझती है अपने ही शरीर से उसे बार बार होता है कमर दर्द नहीं ठहरती आँखों में नींद थका-थका सा रहता […]

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नई सुबह।

एक जीवंत सुबह, विश्वास से भरी हुयी, जल मेँ चमकती सुनहरी किरणोँ सी स्वर्णिम स्वप्नोँ को सँवारने आई  नई सुबह! धुँधलाहट कम करके कण कण को प्रकाशित करती, नई सुबह! वन मेँ बहती चंदन की सुगंध को चारोँ ओर फैलाती पवन की नई सुबह। कहीँ अंबर मेँ फैले बादलोँ को उडाकर उसपार ले जाती नई […]

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आओ उठेँ हम फिर से

रोज दिन उठता है रोज दिन ढलता है काफिला परिँदोँ का ऐंसे ही चलता है पेड चुपचाप खडे रहते, थपेडे हवा हैँ सहते, रोज बादल हो इकट्ठे ऐँसे ही हैँ बहते। अंधेरा रोज शाम आता, निशा का जाम लाता, तारे रोज यूँ चमकते अंबर यूँ ही रह जाता। कुछ मचलता नहीँ है, आगे चलता नहीँ […]

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दौर हैं बदल रहे…

आज अचानक से जहन में एक महान साहित्यकार, कवि, ग़ज़लकार ‘दुष्यंत कुमार’ की एक पंक्ति आ गयी. उस ग़ज़ल की उस पंक्ति को अपनी जुबान से अगर मैं बोल भी लेता हूँ तो मेरे रोंगटें खड़े हो जातें हैं. वो सदाबहार पंक्ति है, ‘हो गई है पीर पर्बत सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई […]