कविता

मक्कड़ जाल

जिंदगी की उलझनें भी क्या उलझनें हैं एक सुलझाते सुलझाते दूसरे में उलझ जाते हैं बड़ा जटिल है यह ताना बाना उलझनों का न ख़तम होने वाली हैं यह उलझनें अगर यह ख़तम हो जाए तो फिर जिंदगी ही क्या इन उलझनों को सुलझाने और उनमें उलझनें का मज़ा ही कुछ और है उलझना और […]

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सघंर्ष

सूर्यं की तरह अटल प्रतिदिन प्रतिपल अनवरत सकंल्प ले सघंर्ष की नीवं रख तू आगे बढ़!!! बाधा कोई भी आए डरना नही घबराना नही गिर उठ सभंल सघंर्ष की नीवं रख तू आगे बढ़!!! सत्य अहिंसा अपनाकर धर्म का पथ प्रशस्त कर बिना रूके बिना ठहरे सघंर्ष की नीवं रख तू आगे बढ़!!! विश्वास का […]

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रूठी कलम

रूठी कलम   आज कोरे कागज पर, इन्सानों की अच्छाई पर, लिखने की इच्छा हुई। कागज सहम- सा गया और कलम भी थम- सी गई।।   किसी कचड़े के डब्बे में, हमें फेंक देना, लेकिन हैवानों को इंसानों, का नाम ना देना।।   थक गई हूं हर रोज़ निर्भया की , कहानी लिख- लिख कर। […]

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अपना अनुभव

कभी सोचता हूं कि कुछ नया नायाब लिखूं जो भी अब तक लिखा सब पुराना पढ़ा पढ़ाया था पर क्या लिखूं सब तो सबको पता सुना सुनाया है फिर मेरे पास क्या है कहने को वहीं पुरानी घिसी पिटी बातों का दोहराव लोगों का कहा सुना नहीं नहीं यह कोई बात नहीं सोचना तुम्हारा है […]

कविता

हीरो बनाम विलेन

फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हॉट्सएप, ट्वीटर…. अपने आप में ‘कॅरोना’ वायरस हैं ! कोई मुकम्मल ‘हीरो’ नहीं होता, कोई मुकम्मल ‘विलेन’ नहीं होता ! ×××× ऐसे असंख्य लोग हैं, जो ‘कर्म ही पूजा’ से परे होकर कंदरा, हिमालय और पत्थर में भगवान ढूढ़ते हैं, जबकि माँ-बाप की सेवा ही कर्मफल है! ×××× देश के अंदर कई तरह […]

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भाषा का डॉक्टर

भारत में धर्म की कोई कमी नहीं ! यहाँ लोगो को रोटी चाहिए  ! विवेकानंद कहिन । ×××× मज़हब वही सिखाता, आपस में वैर रखना; जिस ओर सर किसी का, उस ओर पैर रखना ! ×××× शिक्षक-संघ सरकार से रजिस्टर्ड हैं, जिनके आह्वान पर सदस्य-शिक्षक हड़ताल पर…. प्राथमिकी अगर हो तो संघ पर हो, शिक्षकों […]

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राजनीति एक विधा है

एक और मगध सम्राट ‘नंद’ कुमार के साम्राज्य को ढहाने को ‘चाणक्य’ (नियोजित शिक्षक) ने चोटी खोल (हड़ताल का हड़कंप) दी है ! ×××× राजनीति वो विधा है, जो श्मशान व क़ब्रिस्तान में भी जीवन ढूढ़ते हैं ! ×××× 4 साल में एकबार आती है 29 फरवरी भारतरत्न और निशान -ए- पाकिस्तान व पूर्व PM […]

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भ्रष्टाचार

अविश्वसनीय सा लगता है पर भ्रष्टाचार का दीमक हर ओर पहुँच ही जाता है, अब क्या क्या, कहाँ कहाँ बताऊँ अब तो कहते हुए भी शर्म लगता है। अब आप ही बताइये इसे क्या कहेंगे? अब तो लाशों के साथ भी भ्रष्टाचार होता है। कौन है जो दावा कर सके कि यहां भ्रष्टाचार नहीं होता […]

कविता

चिंतन बाल-कल्याण पर

बचपन सबका हँसकर बीते,यह ही बस चाहत है, नहीं रहे वंचित कोय बच्चा,यही मेरा अभिमत है। पालन-पोषण,शिक्षा,शैशव,सब कुछ अब मोहक हो, मिले वही हर बच्चे को जो,उसका समुचित हक़ हो। अधिकारों की बातें होतीं,सच लेकिन उल्टा है, झुग्गी के बच्चों का देखो,जीवन सब पल्टा है। नारे-वादे बहुत हो चुके,अब कुछ करना होगा, बच्चों के बचपन-जीवन […]

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दीवाली का पर्व

हो उत्साहित खूब धूमधाम से इक बार,,, फिर से सभी ने है दीपावली का पर्व मनाया! जला के दीए और रौशनी की लड़ियां है… धरती से तम को भगाया !!   पर,,,, ज्वलंत प्रश्न है समक्ष हमारे, मन के भीतर क्यों? फैला है अंधेरा ! हममें से… है कितनों जनों ने भीतर के तम को […]