Category : कविता

  • यूँ मत देख…

    यूँ मत देख…

    यूँ मत देख कि झुलसती हूँ बहुत तनिक तो कभी ओटकर के देख। तपिश हर वक्त ही सही नही होती कभी तो ओस की तरह झरके देख ।। माना कि बहुत तंग हुई हैे गलियां, जिधर...

  • पुरूष प्रेम

    पुरूष प्रेम

    ऐ, सुनो ! मैं तुम्हारी तरह माँग में सिन्दूर भरकर नहीं घूमता। लेकिन मेरी प्रत्येक प्रार्थना में सम्मिलित पहला ओमकार तुम ही हो। ऐ, सुनो! मैं तुम्हारी तरह आँखों में काजल नहीं लगाता। लेकिन मेरी आँखों...

  • लौ

    लौ

    प्रकृति के अंतर्मन से उदीयमान हो रही थी कुछ संवेदनाएं जेहन में प्रदीप्त हो रही थीं । शांत था अलाव फिर क्यों वो उबल रही थी कहीं कुछ टूट गया गुनगुनाहट हो रही थी । अंजाम...

  • औरत

    औरत

    थक गई हूँ खुद से , जाने क्यों टूटने लगी हूँ। लगता है जैसे खुद को ही छलने लगी हूँ । जंजीरों को कब मैंने बाँध लिया पैरों में स्वतंत्रता की चाह जाने क्यों झुलसने लगी...

  • साहित्य

    साहित्य

    साहित्य कोई बहस का मुद्दा नहीं , समाज का दर्पण है दोस्तो । प्रकृति का चिंतन है , प्रेम का चित्रण है । सदियों की प्यास है , महबूब का मंथन है । तम का अघ्ययन...

  • अनियंत्रित भावनाएं

    अनियंत्रित भावनाएं

    अनियंत्रित भावनाएं विचरती हैं अपने वेग में, कितना भी रोको कितना भी टोको ये अपने ही धुन में, बंदिशों को तोड़कर पहुँच जाती हैं अपने ध्येय तक….. ये निश्छल भावनाएं नहीं जानती, इनकी उच्श्रृंखलता भी नहीं...

  • मेरी हथेली तेरी हथेली

    मेरी हथेली तेरी हथेली

    सिमटती है मेरी हथेली तेरी हथेली  में, अनेकों एहसास उन थोड़े पलों में हो जाते हैं प्रवाहमान, बस इतनी सी ख्वाहिश जिंदा रहती हैं, की बस ठहर जाए ये पल, जी लूँ तुम्हें सदियों की तरह। क्या...

  • मासूम परिंदे

    मासूम परिंदे

    कहीं कुछ चटका शायद दिल का शीशा देखा जब कचड़ा बिनते बचपन। कहीं कुछ टूटा शायद मन का तार पाया जब चिथड़ों में लिपटा अल्हड़पन। कहीं कुछ भीगी शायद नैनों की कोरें निहारा जब चिथड़ों से...

  • गुरु अगर न होते

    गुरु अगर न होते

    गुरु अगर न होते तो जग में राहें चुनना मुश्किल था गुरु न होते तो अर्जुन का अर्जुन बनना मुश्किल था गुरु के जैसा शुभचिंतक और न कोई दूजा है गुरवर के पावन चरणों को ईश्वर...