Category : कविता

  • “कुंडलिया”

    “कुंडलिया”

    मौसम होता प्रौढ़ है, कर लेता पहचान चलती पथ पर सायकल, डगर कहाँ अनजान डगर कहां अनजान, बचपनी साथी राहें संग मुलायम भाव, लौह से लड़ती चाहें कह गौतम कविराय, प्यार तो जीवन सौ सम चक्र...


  • इस जमाने ने…

    इस जमाने ने…

    चलना मुझको आया नहीं चलना सिखा दिया इस जमाने ने… कहना मुझको आया नहीं कहना सिखा दिया इस जमाने ने… सहना मुझको आया नहीं सहना सिखा दिया इस जमाने ने… खाना मुझको आया नहीं खाना सिखा...


  • आर्तनाद

    आर्तनाद

    आर्तनाद वो धरा का पिघलता हो यूँ शबाब बिखर गई वो शमा यूँ अंधेरा हो लाजवाब । चट्टानों की वो खामोशियाँ सुन रहा है जहाँ , द्वन्द के बीच में शान्त चमक रहा आफताब कविता की...

  • एहसास

    एहसास

    गुजरते वक्त का एहसास क्षण क्षण व्यतीत होते जीवन का एहसास अपनों से मिलने का एहसास मिल कर फिर बिछुड़ जाने का एहसास सुखी जीवन का एहसास सुख के बाद दुःख मिलने का एहसास सम्मान प्राप्ति...

  • गृहिणी

    गृहिणी

    हां मैं सिर्फ एक हाउसवाइफ ही तो हूँ समाज की नजरों में जिसका कोई वजूद नहीं । सपनों को आंखों में बसाए , ख़्वाबों को दिल में छिपाए कब बड़ी हो जाती है लड़की उम्र का...

  • तुम को ढूंढ़ा करती हैं

    तुम को ढूंढ़ा करती हैं

    पुरे आठ पहर नज़रे तुम को ढूंढ़ा करती हैं किसी के आहट पे तुम को ढूंढ़ा करती हैं एहसास तो पास का होता है पर नज़रे उदास होती है तेरे बेरुखी आदतों ने मुझे उदास कर...

  • एक जवाब

    एक जवाब

    पेड़ ने कहा “मुस्कराओ “ हमने कहा बिना बसंत के तुम मुस्कुराते हो क्या  ? ****************************************** मोर ने कहा “नाचो “ हमने कहा बिना बरसात के तुम नाचते हो क्या ? ******************************************** कोयल ने कहा “गुनगुनाओ...

  • नहीं बनूँगा

    नहीं बनूँगा

    मैं विद्रोही नहीं बनूँगा मै अवरोही नहीं बनूँगा। तुम उद्दंड भले हो जाओ, मैं निर्मोही नहीं बनूँगा। स्वप्न सदा देखा उन्नति का, सपनों को कभी नहीं मारा। पाव के छाले जख्म बन गये, फिर भी संकल्प...