Category : कविता

  • मनुष्य

    मनुष्य

    जो दिखता है वो होता नही जो चाहता है वो बोता नही दिन भर सोता है रात भर संजोता है कहता कुछ ओर है हंसता है वो, रोता नहीं जो दर्द कभी खोता नहीं आखों में...

  • युग पुरुष

    युग पुरुष

                    “युग-पुरुष “ तपके सोना जब कुंदन हुआ जग में उसका वंदन हुआ तपने का दर्द तो वही  जाने युगों तपे जो ऐसी चमक पाने। समय बड़ा था वो कठिन चारों ओर थी लपटें भीषण धैर्य...


  • सफ़र

    सफ़र

    इस जमाने में बहुत लोग मिलेंगे                     कुछ सहारा देंगे कुछ मायूश करेंगे लेकिन हमें सोचना है हम क्या करें इस जालिम जमाने से कैसे लड़ें यदि इनसे...

  • आजादी

    आजादी

    “आज़ादी ” शहीदों ने लिखीं थी आज़ादी रक्त से अपने,भारत माँ के भाल नहीं मिली ये आज़ादी हमें बिना खड़ग, बिना ढाल । अनेक मांओं ने खोएं थे उस लड़ाई में अपने लाल हुई थी देश...

  • लिखती हूँ……

    लिखती हूँ……

    कुछ सोच कर कहाँ लिखती हूं मैं तो बस अपने जज्बात लिखती हूं आंखें बंद करती हूँ सोचती हूं पल दो पल आती है नजर जो बात वही बात लिखती हूँ कोई सच या झूठ कहाँ...

  • “कुंडलिया”

    “कुंडलिया”

    कटना अपने आप का, देख हँस रहा वृक्ष। शीतल नीर समीर बिन, हाँफ रहा है रिक्ष।। हाँफ रहा है रिक्ष, अभिक्ष रहा जो वन का। मत काटो अब पेड़, जिलाते जी अपनों का।। कह गौतम कविराय,...


  • लोग आजकल

    लोग आजकल

    आग की लपटों के नीचे एक राख सी है। बर्फ पिघल रही है मगर एक भाप सी हैं।। यूं तो रोशनी हर तरफ उजाला फैलाती हैं । लेकिन लोगो के खुले जख्मो को दिखाती है।। माना...

  • मन निशब्द

    मन निशब्द

    मौन हुए शब्द,कलम भी निशब्द है। अंतरात्मा क्षुब्द,दिमाग भी ध्वस्त है।। मन की चीख़ों की मन मे मौत हो गयी। दिल की अग्नि लगभग शिथिल हो गयी।। जिज्ञासाओ का यौवन भी प्रौढ़ हो गया। बनते जहाँ...