इतिहास कविता

हाइकु

“हाइकु” कर दो दान है मकर संक्रांति मिटती भ्रांति।।-1 लो बधाई खिचड़ी खवाई शादी सवाई।।-2 तिल पापड़ी गर्म आग तापनी गुड़ के लड्डू।।-3 मधुर ख्वाब बसंत की सुमारी फूलों से यारी।।-4 हिन्दू त्यौहार सु स्नेह की बौछार श्रद्धा अपार।।-5 महातम मिश्र ‘गौतम’ गोरखपुरी

कविता

नापाक दर्द

अपनी आत्मा को झिंजोड़ के देखना वो भी अश्क बहाने लगेगी मुझे सोच कर। अगर फिर भी तुमको सुनाई न दे तो समझ लेना तुम बहरे हो कानों से नहीं अपनी सोच से भी। मेरे बहते हुए अश्कों में महसूस करना, मेरी अंतरात्मा के दर्द को। अगर महसूस न हो तो समझ लेना तुम पत्थर […]

कविता

मिट्टी का गुल्लक

क्या यह सच है, भैंस का दूध पीने से बुद्धि ‘मंद’ अथवा ‘थेथर’ होती है ? एक देहाती कहावत ! हाँ, हम काले हैं; काली होती है जैसे चट्टान; फूटती है जिसके भीतर से; निर्झर की बेचैन धारा; जिससे दुनिया की प्यास बुझती है ! यह खगेन्द्र ठाकुर कहीस! कुछ मजबूत चीजें कमजोर घेरे में […]

कविता

त्यौहार की खुशियां

त्यौहार की खुशियां कभी-कभी बनने वाले पकवानों की खास महक पहले जी बड़ा ललचाती थी, तीज-त्यौहार के मौके पर जो पहले कभी रसोई ‘राजसी’ बनाई जाती थी। इकट्ठे हो सारे कुटुम्ब की स्त्रियां तैयारी में हाथ बंटाती थीं, मिल-जुलकर काम करने से खाने की खुशी कई गुना ज्यादा बढ़ जाती थी। सही मायनों में त्यौहार […]

कविता

ये जिंदगी

बनते बिगड़ते रिश्तों का लेखा जोखा है ये जिंदगी रोज नये रिश्ते बनते और टूटते हैं क्या यही है जिंदगी? कभी धुप में रिश्तों की छाया देती है ये जिंदगी, कभी खुशी कभी गम की बरसात देती है ये जिंदगी। क्या यही है जिंदगी? किसी पे आस किसी पे विश्वास है ये जिंदगी, कभी किसी […]

कविता

हमने इश्क़ नही बनारस किया था

एक दूसरे के हर आदतों को, बनारस के कण कण में महसूस किया था। बनारस की विविधता ने हमे, साथ बिताने को कितने खूबसूरत लम्हे दिया था। उन लम्हों को हमने भी क्या खूब जिया था। सच में हमने इश्क़ नही बनारस किया था। मै काशी विश्वनाथ के पुरानी दीवारों सा था, और वह उन […]

कविता

कभी कभी

  कभी कभी कभी- कभी हाँ जी कभी- कभी, हमको भी सोचना चाहिए खुद के लिए। क्यों हम औरतें कभी कभी, कुछ भी टाल देती है वो सब, जो पसन्द होता हमको भी , यह कह कर की अकेले है ।। करो वो सब काम भी रोज़, जो पसन्द हो तुमको हमेशा, खाओ अकेले भी […]

कविता

100% सच

यही बात बाकी नियोजित टीचर नहीं समझते हैं ! जी, आप हैं…. यह मुझे पता है ! आप जो कर सकते थे, आपने किया…. आप ऐसा नहीं सोचेंगे कि आपको कह रहा हूँ, आपने अपना बेस्ट दिया ! किन्तु वास्तविकता यही है कि हमलोगों के फेवर में कुछ नहीं आएगा, वहाँ से कुछ भी ! […]

कविता

मैं हूँ न !

दूसरे नियोजितों से कितनी अपेक्षा रखूँ ? सभी अपने नहीं होते ! मैं हूँ…. जीवन में बहुत आगे बढ़नी है…. दूसरों के कारण अपने को कबतक दुःखी करेंगे ! जब कोई रिजिड है, तब क्या करते ? तब आप सब के लिए हड़ताल में जाना ठीक नहीं होता ! मार्गदर्शन को छोड़कर वो सुनते ही […]

कविता

कुछ रिश्ते

कुछ रिश्ते अपने आप मुझसे जुटते हैं और दिल झटके से तोड़ वापस चले जाते हैं ! रिश्ते का न रफू होगा, न फेविकोल से चस्पेगा ! पुरुष मित्र और महिला मित्र के बीच क्या-क्या फीलिंग्स हो सकते हैं ? कोई जानते हैं, तो बताएंगे ! सचमुच में कुछ रिश्ते फिलिंगलेस होते हैं !