Category : कविता

  • क्रंदन करते रिश्ते

    क्रंदन करते रिश्ते

    क्रंदन करते रिश्ते तलाश रहे नई राह टूटी माला के मोतियों से बिखर रहे हैं दूर हो रहे अपने धागे से जिसने सबको एक साथ बांधे रखा रुई की भांति हल्की हो रही हैं संवेदनाएँ और...

  • गंगा की व्यथा

    गंगा की व्यथा

    निकलती हूँ मैं जब शिवजी की जटा से स्वच्छ,निर्मल और स्फटिक जल लेकर, हो जाता स्वस्थ,दुर्बल,अस्वस्थ मनुष्य मेरे अति गुण वर्धक निर्मल नीर पीकर। कल कल ध्वनि गुंजित करता नीर मेरा निकलता सौंदर्य की छंटा बिखेर...

  • साल दर साल

    साल दर साल

    साल दर साल यूँ ही बदलते चले गए, उम्र बढ़ती गई , सपने मरते चले गए। क्या कुछ बदला पिछले कुछ सालों में, हाँ हर साल धोखो के चेहरे बदल गए। साल दर साल मेरा चेहरा...

  • सत्य

    सत्य

    सत्य पराजित है खड़ा , झूठ का होता सम्मान। मान अपमान के भवर में डूब रहा सच्चा इंसान।। नैया सच की है डोलती और खिवैया झूठो का यार। जब नैया डुबाये खिवैया ही फिर कैसे हो...

  • जिम्मेदारी

    जिम्मेदारी

    सर्द हवाओं में सुबह के अंतिम अंधकार में, मुँह और सर को ढककर वो अपने बच्चो की पढ़ाई कमाने के लिए घर से निकल पड़ा है। शाम ढले तक बच्चो को खिला सके भरपेट खाना, बस...


  • बचत का सलीका !!

    बचत का सलीका !!

    माँ तुम जौहरी तो नहीं थी न ही कोई व्यापारी पर परखने का तरीक़ा बचत का सलीका कब कहाँ कैसे खर्च करना है शब्दों को कहाँ किसी टूटे औऱ कमज़ोर का सहारा बनकर उसे ताकतवर बना...

  • पहेली (कविता)

    पहेली (कविता)

    तेरी पहेली सुलझाऊँ कैसे ए जिंदगी तुझे रिझाऊँ कैसे वक्त ने तन्हाई दी हमें अब खिलौनों से खेलकर जिंदगी तुझे मनाउँ कैसे? कभी बच्चों से घर आँगन गुलजार हुआ करता था। अब अकेले पन में मन...


  • नकारात्मक सोच

    नकारात्मक सोच

    नासमझ मन नकारात्मक सोच में डूबा जंगल की लताओं सा उलझा रहता है ढूंढता उजाले को अंधेरे रास्ते पर चल पड़ता है मनोबल की कमी से भटकता सभंलने की कोशिश में बार-बार गिरता दुखद पलों को...