Category : कविता

  • मिस्ड काल

    मिस्ड काल

    मिस्ड कॉल पड़ी स्मृति के किसी कोने जिनमें दर्ज हो सकती है किसी की शरारत किसी की भूल किसी की ज़रूरत किसी की आदत किसी की विपन्नता मिस्ड कॉल असंख्य बार उभर आते हैं मोबाइल स्क्रीन...


  • ॥स्त्री बनने के बाद॥

    ॥स्त्री बनने के बाद॥

    जैसे दिया जूझता है हवा के झोंके से किसान लड़ता है टिड्डियों के हमले से बच्चा निपटाना चाहता है अपना होमवर्क सूरज तैरता है बादलों की नदी में उम्र के इस पड़ाव पर स्त्री जूझती है...

  • नई सुबह।

    नई सुबह।

    एक जीवंत सुबह, विश्वास से भरी हुयी, जल मेँ चमकती सुनहरी किरणोँ सी स्वर्णिम स्वप्नोँ को सँवारने आई  नई सुबह! धुँधलाहट कम करके कण कण को प्रकाशित करती, नई सुबह! वन मेँ बहती चंदन की सुगंध...

  • आओ उठेँ हम फिर से

    आओ उठेँ हम फिर से

    रोज दिन उठता है रोज दिन ढलता है काफिला परिँदोँ का ऐंसे ही चलता है पेड चुपचाप खडे रहते, थपेडे हवा हैँ सहते, रोज बादल हो इकट्ठे ऐँसे ही हैँ बहते। अंधेरा रोज शाम आता, निशा...

  • दौर हैं बदल रहे…

    दौर हैं बदल रहे…

    आज अचानक से जहन में एक महान साहित्यकार, कवि, ग़ज़लकार ‘दुष्यंत कुमार’ की एक पंक्ति आ गयी. उस ग़ज़ल की उस पंक्ति को अपनी जुबान से अगर मैं बोल भी लेता हूँ तो मेरे रोंगटें खड़े...


  • कविता : सुई-धागा

    कविता : सुई-धागा

    तुमने जोसुई-धागा दिया था सितारे टाकने को…उससे मैने अपनी उदासी की उधड़ी चादर टांक लीकोई क्योंकर जान पाएउदासियों के पीछे कौन रहता है…(यकीन मानो मैने अबतक किसी को जानने नहीं दिया की….सितारे कहाँ है…टाकने कहाँ थे और सुई-धागा...

  • कविता : असहमति के सोलह साल

    कविता : असहमति के सोलह साल

    विवाह के सोलह साल बादसोचती है श्यामलीकभी सहमती नहीं ली गई उसकीदेह उसकी थी देहपति दूसरा…सहमति नहीं ली गई उसकीजब पहली बार किन्ही निगाहों नेबाहर से भीतर तक नाप डाला उसेउसकी देह के बारे में जितना जानते...

  • कविता : कविता चाँद पर

    कविता : कविता चाँद पर

    हवाओं से रगड़ खा खा करछिल गए कन्धेहथेलियों पर बादल टिका कभी नहीं टिकाआँखे धूल सने आसमान परजहाँ ना कोई नक्षत्र ना आकाशगंगा…अमावस की रात मेंअपना ही हाथ सूझे ना सूझे…पर कविता अगर चाँद पर लिखनी...