Category : कविता

  • वृक्ष

    वृक्ष

    सहता रहा मौसमों की मार रह ख़ामोश धीमे-धीमे एक छतनार वृक्ष। सूखती रही नमी झरते रहे पात सूख गईं शाख़ाएँ ठूँठ हो गया वृक्ष तन्हा कर गए जो साथ थे – ग़र्ज से नहीं मारता पर...


  • गीत

    गीत

    मौसम -मौसम दुरभिसंधियां, पवन-पवन वैराग है। फागुन- फागुन पानी है, सावन – सावन आग है। ताल तलैया बूँद बुलाये, नंगी नदी होंठ पथराये, सोये सोये झरने सारे, कालकलौती झील मनाये, कैसा कुम्भ, कहाँ का संगम, प्यासा...





  • कैसे कहूँ

    कैसे कहूँ

    कैसे कहूँ कितने प्यारे हो तुम मेरी जान पे भी वारे हो तुम नही जानता पाल रखी हैं कितनी हसरतें बीते वर्षों में मैंने बस इतना अहसास जरूर हुआ की हम ना रहे हम हम अब...


  • राह

    राह

      सूरज चढ़ता था और उतरता था…. चाँद चढ़ता था और उतरता था…. जिंदगी कहीं भी रुक नही पा रही थी, वक्त के निशान पीछे छुठे जा रहे थे, लेकिन मैं वहीं खड़ा था…. जहाँ तुमने...