Category : कविता

  • नारी …

    नारी …

    न मैं राधा हूँ न मैं मीरा न मैं सीता हूँ न मैं गांधारी न मैं लैला हूँ न मैं सोहनी न मैं देवी हूँ न मैं दासी मैं तो सिर्फ ईश्वर की रचना त्याग, प्रेम...

  • वंदना

    अंबर सुनहरा लगे, शशि जहाँ ठहरा लगे, ऐसे मनभावन मेँ लगता न मन है। झूमती हैँ झूलती हैँ झुकती हैँ फूलती हैँ, पुष्प की बेलोँ को नित छू रही पवन है।। और गंध माल की ये...

  • विश्वास

    विश्वास

    जब देखती हूँ आज शिखर पर पहुँच कर अपना गुजरा हुआ जमाना तो मन आज भी खोल कर रख देता है एक एक रिस्ता हुआ घाव जिस की टीस अब भी ताजे दर्द का अनुभव करा...


  • महिला दिवस पर विशेष …

    महिला दिवस पर विशेष …

    अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस ०८ मार्च को  मनाया जाता  है | वैसे तो भारतीय सन्दर्भों मे प्रत्येक दिन ही महिला दिवस है क्योंकि सत्ता से घर तक महिलाएं ही सर्वोपरि हैं | फिर भी फाइव स्टार सभ्यता...

  • वादा

    वादा

    वो चले जाते हैं फिर लोट के आने का वादा करके मगर हम हैं की हटते ही नही न जाने का इरादा करके कोई सम्झादे उन्हें की रत्ती भर भर भी सब्र नही हममे जिन्दा हैं...

  • अप्रैल फूल

    अप्रैल फूल

    सोने ने लोहे से कहा- यार! पिटते तो हम भी हैं और……पिटते तो तुम भी हो मैं तो उतना नहीं चिल्लाता जितना तुम चिल्लाते हो लोहे ने अनमने से रुंधे स्वर में कहा- हाँ, तुम्हें तो...

  • चाहता है !

    चाहता है !

    देखना चाहता है समाज आज भी नारी को बस खूंटे पर बंधी गाय ! पालतू पशु, पिंजरे में कैद, पंछी के पर कटे घर में पड़े बेजान सामान सा! चाहता है पुरुष साड़ी में लिपटी मुंह...

  • मैं

    मैं

    मैं समाज और संसार के बीच  की वो धुरी हूँ जो प्रकृति  का सन्तुलन बनाये रखने मैं समर्थ है मैं सिफ ज़रूरत नहीं मैं जननी हूँ मैं उत्पत्ति हूँ तुम्हारे चाहने- नहीं चाहने से कूछ नहीं...

  • स्त्री

    स्त्री

    रसोई से उठते, घी के धुँये सी सुबह, दीपक की लौ सी जलती शामें! भाव का दीप प्रज्जवलित कर, खुद को ही खडा कर लेती हूँ, भगवान के आगे! दिन की वीरानी जब , साँय -साँय...