कविता

कविता : जो टूट गया

सधे हाथों से थाप थाप कर देता है आकारगढ़ता हैं घड़ा गढ़ता हैं तो पकाता हैंपकाता है तो सजाता हैसज जाता है जो… वह काम आता है…हर थाप के साथ खतरा उठाते हएथपते हुए , गढ़ते हुए रचते हुए , पकाते हुए टूट जाता है जो…वह टूट जाता है….जो काम आया…उसकी कहानी आप जानते हैजो टूट गया , मैं तो […]

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♫प्रेरणा गीत ♫- ☼ दूर है मंजिल !☼

☺☻…..***♪ ♪ ♫ ♪ ♫ ♪ ♪ ♫ ♫***……☻☺ ll दूर है मंजिल  तारे जैसे चमकते हैं सारे  इनको पाना ही मतलब है जीवन का प्यारे  वो भी , थे इंसा, जिन्होंने चाँद पर  कदम रखा इक दिन  तू भी , है इंसा, तो क्यूँ न करेगा  तू भी ये इक दिन  ll  दूर है […]

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पिया का प्यार

अपने अपने पिया का प्यार पाने के लिए, सुहागन ने स्वयं को दुल्हन सा सजाया है, बालों में लगा कर भीनी भीनी खुशबू का गजरा, चमकती लाल बिंदिया से क्या माथा चमकाया है, कानो में झुमके नाक में नथनी, मांग में सिन्दूर सजा, अपने पिया को प्रेमालिंगनं के लिए पूरा उकसाया है, सुहागन ,कंगन खनका […]

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कविता : रहो देखते यू.पी. वालो…

यह कविता मैंने उत्तर प्रदेश के २०१२ के विधानसभा चुनावों के परिणामों के तुरंत बाद लिखी थी. इसमें मैंने उ.प्र. का दिवाला पिटने की सम्भावना जताई थी. यह कविता ‘युवा सुघोष’ के मई-जून २०१२ के अंक में छापी गयी है. इसे पढ़कर देखिये और आज की स्थितियों की तुलना कीजिये कि मेरी वह आशंका कितनी […]

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जब प्रियतम मुझसे बात करें

जब धर्म – कर्म की बात करूँ, ये मर्म सदा उत्पात करें जीवन के दुर्गम पथ पर ये, ..बस कष्टों की बरसात करें सब लोग सोच के जीते है, कि मर के मोक्ष को पा लेंगे मुझे जीते जी मोक्ष मिले, जब प्रियतम मुझसे बात करें पाप पुण्य के ज्ञान सभी, प्रिय व्यर्थ प्रेम के सन्मुख हैं प्रियतम से हर्षित […]

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मन : हार जीत

मन हारा तो मैँ हारा मन जीता तो मैँ जीता पल पल क्षण क्षण जीवन संग्राम, मन के बाहुबल मेँ बीता। खंड खंड हो गयी चेतना, तार तार जब मेरी वेदना, कौन अपना कौन पराया, खुला समकक्ष ये कभी भेद ना, जब उठाया मन का अस्त्र तो काटा बाधाओँ का फीता, मन हारा तो मैँ […]

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नेपथ्य

मन के स्पंदन करते तार, क्रंदन करती झनकार, कुछ डूबते से उठते से मन को, फिर घेर रहा अंधकार, घनेरा तमस फैला, भटकता मन अकेला, पथ के आवर्तोँ से हारा, कब होगा नवउजियारा। तब किलकारी लेती भोर उठी, ले विश्वास पूरब के छोर उठी, प्रकाश तिमिर को चीरता बढा, अंबर पर सूरज ने उल्लास भरा, […]

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*अब सपनोँ को जीना है!*

घट कालकूट का पडे पीना, चाहे छलनी कर दे कोई सीना, मैँने इतना ठान लिया है, जीवन को रण मान लिया है, इस रणक्षेत्र मेँ बहाना होगा अपना खून पसीना है, अब सपनोँ को जीना है। ये कर्मक्षेत्र है, धर्मक्षेत्र है, नहीँ सूने अब मेरे नेत्र है, आशा अभिलाषा की बना कसौटी, पी पीकर चाहे […]

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मेरा हिँदुत्व

मेरा हिँदुत्व केवल धर्म नहीँ है, पंथ नहीँ है, वर्ग नहीँ है, ये मन की विचारधारा है, मुझको प्राणोँ से प्यारा है, ये जीवन जीने की कला महान, ये सत्यपथ का महाविज्ञान, ये कोई जात नही है, ये विचार की बात नही है, ये मन से मन का जोड है, भ्रम उलझन का तोड है, […]

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संध्या

सूरज पश्चिम के तट खडा है, आज बादलोँ का जमघट बडा है, संध्या की बेला लेती अंगडाई है, भगवा चदरिया अंबर पर छाई है। पवन मद्धम बहती है पंछी चहकते हैँ, बाग बाग सुरभित कर गुलाब महकते हैँ। दूर कहीँ चंदन के वन माधुरी फैलाते, तिमिर उठता देख झीँगुर गुनगुनाते। कलरव करती चिडियोँ का झुंड […]