कविता

मिस्ड काल

मिस्ड कॉल पड़ी स्मृति के किसी कोने जिनमें दर्ज हो सकती है किसी की शरारत किसी की भूल किसी की ज़रूरत किसी की आदत किसी की विपन्नता मिस्ड कॉल असंख्य बार उभर आते हैं मोबाइल स्क्रीन पर अथक कोशिश की अनंत वेदना कुछ परिचितों के कुछ अपरिचितों के जिनमे कई बार दर्ज होते हैं उनकी […]

कविता

मेरा भांजा

छोटा सा मुखड़ा हँसती आँखें खिलती जुल्फें नटखट अदा से दे जाता अपनापन जीवन की लालसा जिजीविषा जगाता खुशियाँ बाँटता मुझे माँ कह पुकारता मुझमें कुछ भरता एक रोशनी दे जाता इस दुनिया में सच्चा रिश्ता बताता यह रिश्ता आज भी कल भी जीवन की सच्चाई दे जाता

कविता

॥स्त्री बनने के बाद॥

जैसे दिया जूझता है हवा के झोंके से किसान लड़ता है टिड्डियों के हमले से बच्चा निपटाना चाहता है अपना होमवर्क सूरज तैरता है बादलों की नदी में उम्र के इस पड़ाव पर स्त्री जूझती है अपने ही शरीर से उसे बार बार होता है कमर दर्द नहीं ठहरती आँखों में नींद थका-थका सा रहता […]

कविता

नई सुबह।

एक जीवंत सुबह, विश्वास से भरी हुयी, जल मेँ चमकती सुनहरी किरणोँ सी स्वर्णिम स्वप्नोँ को सँवारने आई  नई सुबह! धुँधलाहट कम करके कण कण को प्रकाशित करती, नई सुबह! वन मेँ बहती चंदन की सुगंध को चारोँ ओर फैलाती पवन की नई सुबह। कहीँ अंबर मेँ फैले बादलोँ को उडाकर उसपार ले जाती नई […]

कविता

आओ उठेँ हम फिर से

रोज दिन उठता है रोज दिन ढलता है काफिला परिँदोँ का ऐंसे ही चलता है पेड चुपचाप खडे रहते, थपेडे हवा हैँ सहते, रोज बादल हो इकट्ठे ऐँसे ही हैँ बहते। अंधेरा रोज शाम आता, निशा का जाम लाता, तारे रोज यूँ चमकते अंबर यूँ ही रह जाता। कुछ मचलता नहीँ है, आगे चलता नहीँ […]

कविता

दौर हैं बदल रहे…

आज अचानक से जहन में एक महान साहित्यकार, कवि, ग़ज़लकार ‘दुष्यंत कुमार’ की एक पंक्ति आ गयी. उस ग़ज़ल की उस पंक्ति को अपनी जुबान से अगर मैं बोल भी लेता हूँ तो मेरे रोंगटें खड़े हो जातें हैं. वो सदाबहार पंक्ति है, ‘हो गई है पीर पर्बत सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई […]

कविता

गद्य काव्य : एक चुप्पे शख्स की डायरी 46 वां पन्ना

ठहर जाने से खत्म नहीं हो जाते रास्ते…थक कदम गए…रास्ते नहीं । हर छूटते मील के पत्थर को देखना…खुद को दिलासा देना है और सामने पड़े रास्ते को देखना बस एक उम्मीद…। पत्थर चले कहाँ तक की सूचना है , कितना बाकी है इसे नहीं पता…यह संशय भी साथ यात्रा करता है…पहुचेंगे वही , जहाँ […]

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कविता : सुई-धागा

तुमने जोसुई-धागा दिया था सितारे टाकने को…उससे मैने अपनी उदासी की उधड़ी चादर टांक लीकोई क्योंकर जान पाएउदासियों के पीछे कौन रहता है…(यकीन मानो मैने अबतक किसी को जानने नहीं दिया की….सितारे कहाँ है…टाकने कहाँ थे और सुई-धागा तुमने क्यों दिया…)

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कविता : असहमति के सोलह साल

विवाह के सोलह साल बादसोचती है श्यामलीकभी सहमती नहीं ली गई उसकीदेह उसकी थी देहपति दूसरा…सहमति नहीं ली गई उसकीजब पहली बार किन्ही निगाहों नेबाहर से भीतर तक नाप डाला उसेउसकी देह के बारे में जितना जानते थे शोहदेउतना तो खुद उसे नहीं पता….असहमति तोडना पुरुषत्व भरा हैयही जानकर सहमति के बिनाजीती रही है उसके साथ […]

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कविता : कविता चाँद पर

हवाओं से रगड़ खा खा करछिल गए कन्धेहथेलियों पर बादल टिका कभी नहीं टिकाआँखे धूल सने आसमान परजहाँ ना कोई नक्षत्र ना आकाशगंगा…अमावस की रात मेंअपना ही हाथ सूझे ना सूझे…पर कविता अगर चाँद पर लिखनी है तोचाँद पर ही लिखूंगा….