कविता

मन आज फिर डूब गया!!

मन आज फिर डूब गया यादों के अंधियारे जंगल में फिर उतरा है बीती के दलदल में आँखों में नीर भर आया शिथिल अंग पड गए फिर कोई घाव उभर आया भावना के भीषण आवेग में बाँध दुखो का टूट गया पथ में फिर अँधियारा छाया फिर मेरा मन कोई लूट गया बिखरी बिखरी जैसे […]

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”’रणभूमि तुम्हे पुकार रही ,,,

अर्जुन उठो आगे बढ़ो रणभूमि तुम्हे पुकार रही धर्म पर संकट है छाया दुर्योधन ने पाँव पसारे, पितामह लाचार हुए सब राजा बने धृतराष्ट्र है सारे, और दुशाषन चीर खेंचता याज्ञसेनी हाथ पसार रही, रणभूमि तुम्हे पुकार रही!  कर्ण अधर्म के पक्ष खड़ा है धर्मराज सब हार गया, भीम क्रोध से जल रहा है शकुनि […]

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आज नदी तट पर बनी दो कविताएँ

२३ जून २०१४ सोमवार हंवर नदी तट पर (कनाडा)  1. आनन्द में अभिभूत हो, कुछ सृष्टि जग में हो गयी;आलोक्य का आलोक लख, अनुभूति अद्भुत हो गयी ।आश्वस्त मन शाश्वत निरख, सुरमय गगन को तक गया;प्रकृति छटा का परश पा, चिन्मय चकोरी बन गया ।बतखों का वृत हिय कबूतर, सरिता निकट तट तक गया;सुरभित सुमन […]

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कविता – वह प्राणवायु सी

वह भी एक बहती हुई हवा की तरह थी कानों के पास आकर फुसफुसाती हुई ठंडे  झकोरे की तरह सिहराती हुई दुपट्टा सम्भाल कर गुजर जाती थी ,ठीक बगल से कभी चुपचाप कभी सूखे पत्तों की खडखड़ाहट की तरह मुझ पर झल्लाती हुई  ……. और , कभी –कभी सुखद स्पर्श से सहलाती हुई बालों की […]

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मैंने हार नहीं मानी है

मैंने हार नहीं मानी है ये रण जीतने की ठानी है क्षण क्षण ऐसे बीता है जैसे जीवन घट रीता है हारी है दुर्भावनाएं सारी बस मन का साहस ही जीता है अब पीछे भूल से हट जाना भी सपनो के संग बेमानी है, मैंने हार नहीं मानी है  पथ मेरा अविरल अटल रहा आँखों […]

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फिर भी मुझे स्त्री होने का गर्व है!

हर कदम पर मुझे दबाने का प्रयास किया जा रहा है फिर भी मुझे स्त्री होने का गर्व है! सुरक्षित मेहसूस नहीं करती हूँ मैं इस सभ्य समाज में फिर भी मुझे स्त्री होने का गर्व है! मुझे इस पुरुष प्रधान समाज में उपभोग कि वस्तु समझा जा रहा है फिर भी मुझे स्त्री होने […]

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कविता : सदियों से सदियों तक

सदियों पुराना प्रेम जब आज की गलियों में भटक रहा था मै सोचता रहा तुमसे इसका जिक्र फिर से करू पुछू तुमसे क्या तुमने देखा है कभी महसूस किया है चाँदनी रात की दुधिया उजास में मन का गीलापन जज्ब हो जाता है तन को उसदम किसी मरहम की जरूरत नहीं होती आँखे टकटकी लगाए […]

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कविता : प्रेम खूँटी से

साँसे अटकी रही प्रेम हाफता रहा देर तलक खो गये रास्ते सभी जो रात में पहुँच ते थे बिस्तर तक सुबकता रहा स्वप्न पलको की देहलीज पर स्वप्न धुलता रहा आँखे सुखती गयी मौन को मौन ताकता रहा खुली बाहों का रिक्त रिक्त ही रहा न चाँद न तारे ही भर सके उसे जलाशयों की […]

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कविता : तुमसे बड़ा धूर्त नहीं कोई

तुमसे बड़ा धूर्त नहीं कोई तुम रिश्तो के बीज बोने में अव्वल हो पर तुम्हारे भीतर पनप रहे अहं को रोक लो तुमने अबतक गिनवा दिए न जाने कितने स्वार्थी लोगो के नाम गिनवाते जाने की आतुरता तुम्हारे भीतर से भी छलका रही है स्वार्थ , तुम भी इससे परे नहीं आदतन ही तुमने न […]

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कविता : गर्व होना चाहिए

नारी क्यों ढाल बने नर की उसे तो भाल बनाना चाहिए उसको ढाल बनाये जो नर उसका नहीं इस्तकबाल होना चाहिए पुरुषो की अहमी सोच को हमेशा किनारे रखना चाहिए नर दिखाए जो तेवर तो नहीं निराश होना चाहिए दुर्गा चंडी नारी का ही रूप है उसे यह अहसास होना चाहिए दरिंदो के मन में […]