कविता

कविता : दहेज़ – १

बहू आज ही ससुराल आयी सास बोली बहू तू पीहर से क्या क्या साथ लाई बहू बोली- मां जी मेरे पिताजी ने अपनी जायदाद बेचकर मेरी शादी रचाई इससे आगे उनकी हैसियत कुछ देने की न आई सास बोली- तेरा बाप अगर तुझे बेचता और जमीन जायदाद ही दे देता तो हम न सही कलमुंही […]

कविता

मौन

पृथ्वी गेंद हैं घूमती हैं पृथ्वी पतंग हैं ,उड़ती हैं पृथ्वी गिरे तो कहाँ गिरे उठे तो कहाँ उठे ग्रह उपग्रह सितारें और अंतरिक्ष के सभी नज़ारें एक दूसरे के हैं सापेक्ष मनुष्य ही करता हैं कोशिश जीने के लिए निरपेक्ष बाहर के शून्य के ही जितना मन के भीतर भी है शून्य उसे ही […]

कविता

परिवर्तित व्यवहार

  अक्षर शब्द रस छंद ,और अलंकार देख कर मेरा परिवर्तित व्यवहार मुझसे पूछते हैं कब हुआ तुमसे ,मेरा प्यार झरता हैं अमलताश घेर लेते हैं मेरे गले को पुष्प बनकर हार पल भर के लिए भी जाता नहीं मेरे मन से तुम्हारा विचार कोई बात नहीं होती फिर भी मुस्कुराने लगता हूँ आँखों की […]

कविता

रूप

तुम्हें मै किस तरह से पुकारू किये बिना शब्दों का उच्चारण क्या तुम सुन लोगी मौन के मूक स्वरों से भरा मेरा आमंत्रण बिना नाम के बिना आकार के आखिर तुम हो कौन जिसका सौन्दर्य मुझे लग रहा हैं असाधारण बादलों के रंगों से अंबर पर कर लेती हो तुम अपना नयना अभिराम चित्रण पंखुरियों […]

कविता

खिल उठते हैं

खिल उठते हैंजब पतंग की तरह उड़ा करता था मन वह था मेरा बचपन सौंदर्य की आंच से झुलस जाने को तरसता था तन वह था मेरा यौवन बीत गए मेरी उम्र के अनगिनत बासंती क्षण ख्यालों के जल में अब परछाईयाँ शेष हैं उन्हीं मधुर पलों के सायों का मैं किया करता हूँ एकांत […]

कविता

कविता : रिश्ता क्यों टूटा ?

लड़के को लड़की पसन्द आयी लड़की को लड़का पसन्द आया मां-बाप दोनों के खुश हुए यह रिश्ता तय करके बात हुई जब ऐसी लड़की के मां-बाप भड़के लड़के ने मना किया जब शादी में कुछ भी लेने से सभी ने बहुत समझाया पर असर न हुआ लड़के पे तब! रिश्ता तोड़ा लड़की वालों ने उन्हें […]

कविता

हरी हरी पत्तियां पीले पीले फूल

बांहों में उग आये काँटों से दुखी: न हो बबूल पवन कहें तुमसे संग मेरे झूम नदिया कहें झुलसी टहनियों से परछाई बन मेरी शीतल काया कों चूम महा एकांत के वन के मौन कों सुन कराहती हुई पगडंडी के थके नहीं पाँव चलती ही चली जाए इस गाँव से उस गाँव मानो उसकी अपनी […]

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बाल दिवस की शुभकामनाएँ

आज भी जिन्दा मासूम बचपन खंगालो मन । लेते जनम नित नए सपने बालक मन । नन्हा शैशव संसारी चाकचिक्य खोजे वैभव । कोमल मन अब्धि सी मोह माया डूबे उबरे । गया डकार गुंजित बचपन आज का दौर । समय पंख बचपन के स्वप्न उड़ा ले भागा । ….गुंजन अग्रवाल

कविता

मेरी आत्मा एक नदी है

मेरी आत्मा एक नदी है बिखर जाती हैं जब ज्योत्सना अम्बर से अप्सरा सी उतर आती हैं मेरी कल्पना प्रेम स्नेह ममता और करुणा के जरिये देती हैं मुझे वह फिर सांत्वना लोग कहते हैं सुकुमार ख़याल को मेरे मन की आत्म प्रवंचना नीम सा कितना भी कटु हो सह लिया करता हूँ मैं वह […]

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बचपन

बाल दिवस पर विशेष  कितने प्यारे होते हैं बचपन के वो दिन सब संग हंसना खेलना मिलते ही दोस्त बना लेना न दुनियादारी की चिंता न अपने-पराये का भरम वहीं लड़ना वहीं माना जाना छुपम-छुपाई , लंगडी खेलना कितने सारे खेल होते थे तब तो दिलों से मेल होते थे उन्मुक्त जीवन जीते थे दिल […]