कविता

सिस्टम …….!

आये दिन लटकती लाशे फूल बनने से पहले दम तोड़ती कलियाँ बलात्कार, चोरी , डकैती हत्या , आतंकवाद रोजमर्रा की ज़िंदगी में इस कदर घुल चुकी है और सिस्टम चुप है खामोश है ! ……। हा हा हा हा सिस्टम ही ही ही ही ये साला सिस्टम किस चिडया का नाम है भाई कोई सपना […]

कविता

***मैँ मध्यप्रदेश हूँ ***

मैँ भारत माता का हृदय हूँ, सत्य सार्थक की विजय हूँ, ग्वालियर का राजभवन मै, उज्जैनी का महाकाल हूँ, राजाओँ की नगरी इंदौरी ठाट बाट का भोपाल हूँ। खजुराहो का शिल्प महान फिर, बाँधवगढ का शेर हूँ, कभी शीतल जल का धुँआधार मैँ, खेतोँ की मीठी बेर हूँ। नर्मदे की कल कल धारा, शिप्रा का […]

कविता

और पेड़ बहुत रोया….

मेरी इन दो भुजाओँ मेँ, मेरी पत्तियोँ की छाओँ मेँ, दो मासूम कलियोँ को दरिँदोँ ने मसल डाला, मैँ देखता रह गया, मेरी भुजाएँ मेरी टहनियां, जिसपर टंगी दो बेटियां, मानवता के निर्मम हत्यारोँ का शिकार हो गयीँ, सपने संजोने की उमर मेँ बलात्कार हो गयीँ। मैने पिता के हृदय को अकस्मात महसूस किया, दृश्य […]

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कविता : मिलता हूँ रोज खुद से

मिलता हूँ रोज खुद से, तभी मैं जान पाता हूँ, गैरों के गम में खुद को, परेशान पाता हूँ। गद्दार इंसानियत के, जो खुद की खातिर जीते, जमाने के दर्द से मैं, मोम सा पिंघल जाता हूँ। ढलती हुयी जिंदगी को, नया नाम दे दो, बुढ़ापे को तजुर्बे से, नयी पहचान दे दो। कुछ हँस […]

कविता

कविता : भय मुक्त

रात जहाँ पहुचती है घुप्प अँधेरे के साथ मौत अपने वहशीपन से बाहर निकलकर विचरण करती है तलाश करती किसी की जिन्दा लाश जहाँ एक अंतहीन सन्नाटा पसरता जाता है झील करवट बदलती है चीटियाँ तक छिप जाती है बिलों में भला भय पर विजय पाना भय को जीत लेना नहीं भय की गहराई में […]

कविता

कविता : चुप्पी अतिआवश्यक है

संघर्ष सृजन के लिए किया जाता रहा सृजन से फिर आकांक्षाओं की पूर्ति पूर्ति के बाद बढ़ता उबासीपन उबासिया से पुरी देह में पसर गयी एक चुप्पी एक चुप्पी ही जीवन का भेद खोल देती है वो दरवाजे भी खोल देती है जो पडोस के मुहाने पर थे शंका बनी ही रही आवाज तो नही […]

कविता

मेरे हमनसी मेरे दिलबर अपने प्यार का पता दे

मेरे हमनसी मेरे दिलबर अपने प्यार का पता दे तू दूर क्यों है हमसे इतना जरा पता दे तेरे प्यार के ही खातिर ,दुनियाँ बसायी मैनें तेरे प्यार को ही पाकर महफ़िल सजाई मैनें जितने भी गम थे मेरे उनको मैं भूलता था मेरी दिलरुबा मेरे दिलबर तुमको ही पूजता था मंज़ूर क्या खुदा को […]

कविता

कुंवारी लडकियाँ …

कुंवारी लडकियाँ … गिनती है पिता के माथे की शिकन और फिर गिनती है अपनी उम्र हाथ के उँगलियों में कई बार हर बार चूक समझकर दुहराने लगती है अपनी ही गिनती माँ से पूछती है अपने जन्म की सही तारीख  और दर्ज कर लेती है एक और अनचाहा सच हमउम्र सहेलियां जब लौट आती […]

कविता

61वां पन्ना (एक चुप्पे शख्स की डायरी)

समझ आते आते ही आया तुम्हारा प्रेम…। परिंदों से प्रेम करते हुए पिंजरे खरीद लाए… हिरण जंगल से बाड़े में आ गए..। प्रेम कहते रहे और बनाते रहे मकान का नक्शा… कि जिसमे लोग दो रहे और कमरे तीन हो…। हर खुली जगह जमीन की बरबादी की तरह देखी जाती रही…. अभियंताई बहस तब तक चली… […]

कविता

हाइकु

1 तड़ तड़ाक बची नहीं गरिमा चोटिल आत्मा । ===== 2 तड़ ताड़क सहमा बचपन देख माँ गाल । ===== 3 तड़ तड़ाक रिश्ता नाजुक टूटा काँच सा कच्चा । ===== 4 हर्ष अपार घन लेकर आये फुही बहार । ===== 5 छन्न संगीत तपान्त करे वर्षा गर्म तवे सी ===== 6 फुही झंकार लगे […]