शिशुगीत

खरगोश

मैं सफेद हूं जैसे दूध, नरम-गुदगुदा जैसे दूब, हरी घास मैं खाता हूं, दाना भी चुग जाता हूं. आंखें लाल हैं मेरी देखो, खूब तेज मैं भगता हूं, जल्दी मेरा नाम बताओ, मैं तुमको क्या लगताहूं? (खरगोश)

बालोपयोगी लेख

समय से घर पहुँच जाना चाहिए

हमारे घर पापा मम्मी कालेज भेजते हैं तो हमें भी डर लगता है। अपने पापा मम्मी को छोड़कर जाना हमको अच्छा नहीं लगता। भीड़ में कोई गुंडा हमको मार न डाले और हमें नुकसान न पहुँचा दे, हमको इसका डर लगता है। हमें अपने पापा मम्मी को छोड़कर नहीं जाना चाहिए। जाना है तो अपने […]

शिशुगीत

मेरी मम्मी

मेरी मम्मी प्यारी मम्मी सबसे प्यारी मेरी मम्मी पढ़ने भेजती मेरी मम्मी एक दिन अगर पढ़ाई नहीं करते मम्मी डाँट लगाती है फिर पढ़ने बैठ जाओ तो मम्मी खुश हो जाती है सबसे प्यारी मेरी मम्मी

बाल कविता

जल संरक्षण

जल संरक्षण अभियान चलाओ देश में पानी की बचत कराओ नदियाँ और तालाब में कुएँ में और नहर में टंकी में और गड्ढे में इनमें पानी की बचत कराओ पानी अपने काम में लो ना कि यूँ ही फेंकते रहो नदियाँ नहरें कुएँ तालाब हैंडपंप टूयूबैल इन सबसे हमें पानी मिलता अगर तुम यूँ ही […]

शिशुगीत

बंदर

जब मैं उछल-कूद करता हूं, मम्मी कहती ”तू है बंदर”, पर मेरे तो पूंछ नहीं है, मैं कैसे हो सकता बंदर! मुहं भी मेरा लाल नहीं है, और न ही बिलकुल काला, ना लंगूर मैं ना ही बंदर, मुझको तो होना है लाला. 1978 में लिखी पुस्तक शिशु गीत-संग्रह से

बाल कविता

बालकविता “पेड़ों पर पकती हैं बेल”

जो शिव-शंकर को भाती हैबेल वही तो कहलाती है—तापमान जब बढ़ता जातापारा ऊपर चढ़ता जाता—अनल भास्कर जब बरसातालू से तन-मन जलता जाता—तब पेड़ों पर पकती बेलगर्मी को कर देती फेल—इस फल की है महिमा न्यारीगूदा इसका है गुणकारी—पानी में कुछ देर भिगाओघोटो-छानो और पी जाओ—ये शर्बत सन्ताप हरेगातन-मन में उल्लास भरेगा—(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

शिशुगीत

कुत्ता

कुत्ता ‘भौं-भौं’ करता है, नहीं किसी से डरता है, करता है घर की रखवाली, खाता रोटी जो भी पा ली. बच्चों के संग खूब खेलता, गेंद उठाता और फेंकता, पिल्ले इसके प्यारे-प्यारे, ‘कूं-कूं’ शोर मचाने देता.

शिशुगीत

सोशल डिस्टेंस

कोरोना में मजबूरी है, सोशल डिस्टेंस जरूरी है, मन से दो इंच का न फासला हो, तन से जरूरी दो गज दूरी है. घर की सुरक्षित सीमा में रहो, पार्क में भी दूर-दूर रहो, खुद भी दूरी बनाए रखो, औरों को भी दूर-दूर रहने को कहो.

शिशुगीत

मोटर कार

पापा ने ली मोटर कार, मोटर में हैं पहिए चार, मोटर की पौं-पौं को सुनकर, सैर को मैं होता तैयार. सड़कों पर चलती है मोटर, गियर से करती है काम, करके शान से इसमें सवारी, मिलता है मुझको आराम.

शिशुगीत

बिल्ली

कितनी प्यारी मेरी बिल्ली, ‘म्याऊं-म्याऊं’ करती है, चूहे खाती खूब शौक से, पर कुत्ते से डरती है. दूध-मलाई मिल जाएं तो, खाकर खूब उछलती है, प्यार से पालो प्यार बांटती, डांटो खूब मचलती है. — लीला तिवानी