बाल कविता बाल साहित्य

रात ठण्ड की

रात ठण्ड की बहुत बड़ी है, सहज नहीं है अधिक कड़ी है। ठण्ड सताए सही न जाए, और धूप भी पास न आए। सहमे-सहमे सभी खड़े हैं, दांत बजें, कंप-कंपी बंधाये। मुश्किल जीना, सर्द महीना, सिर पर ठण्डक बर्फ जमाये। पंखें-कूलर बन्द पड़े सब, चाय-समोसा सर्दी के संग। कोहरे की भी अकड़ बढ़ी है, रात […]

बाल कविता

संस्कारी बन जाओ

गुरुजन, मात -पिता जन बच्चों को देते है संस्कार, जो बच्चा कहा हुआ माने वे ही बच्चे बनते है महान। सच्चे मार्ग पर चले जो बच्चे वे अपना परचम फहराते है, परिश्रम जो नित करते है वही बच्चे मंजिल पा जाते। शिक्षा सबसे बड़ा धन है बच्चों मन लगाकर पढ़ाई रोज करो, शिक्षा धन से […]

बाल कविता

मेला रंग बिरंगा

गाँव शहर में अक्सर लगते हमने देखा है एक मेला । रंग,बिरंगी उस दुनिया में, पल भर भूले सारा झमेला। सर्कस,जादू ,झूले लगते, मेले से अपना पन बढ़ता । चहल-पहल वो ठेला-ठेली, लेकिन रेला चलता रहता। बन्दरिया का करतब देखा , खाया आलू-चाट, समोसा, मन में आया फिर हम सबने जी भर खाया इडली डोसा […]

क्षणिका बाल कविता

सदाबहार काव्यालय: तीसरा संकलन- 23

1 .चलती रही जिंदगी (क्षणिका) कभी गमों की धुंध कभी खुशियों की धूप कभी सफलता कभी विफलता हौसला और जुनून हिम्मत और लगन ले चलती रही जिंदगी। जीत का स्वप्न सजाती हार को हराती खिलने की चाहत लिए चट्टानों से टकराती मंजिल की ओर बढ़ती रही जिंदगी। थाम लिया दामन ख्वाब का जिद और जुनून […]

बाल कविता

नदी बहती है –बाल कविता

कल कल प्यारी नदिया बहती,चलते चलते वो कुछ कहती,झूम झूम के चलना है जीवन,पथ की बाधाएँ कभी न सहती। मेले लगते उसके तट पे ,जल उसका है अमृत धारा। लघु लघु जब धाराएं मिलती,वृहद रूप में फिर वो खिलती,चांदी जैसी चकमक करती है,जब रवि रश्मि उस पे पड़ती। प्यास बुझाती है वो हरदम जन जन […]

बाल कविता

बालगीत – आ गई रजाई

शीत बढ़ी आ गई रजाई। मौसम ने ली है अँगड़ाई।। दादी अम्मा शी-शी करतीं। ओढ़ रजाई सर्दी हरतीं।। दिन में धूप करे गरमाई। शीत बढ़ी आ गई रजाई।। साग चने का मोटी रोटी। चूर्ण बाजरे की वह छोटी।। खाते हम सब चुपड़ मलाई। शीत बढ़ी आ गई रजाई।। ले-ले स्वाद गज़क हम खाते। शकरकंद मीठे […]

बाल कविता

बालगीत – चूल्हे वाली रोटी

चूल्हे वाली रोटी खाएँ। अपना तन-मन स्वस्थ बनाएँ। बनी गैस की रोटी खाता। रोग धाम तन-मन बन जाता। उदर -रोग दिन – रात सताएँ। चूल्हे वाली रोटी खाएँ।। ईंधन सूखा काष्ठ जला कर। उपलों का उपभोग करा कर। रोटी, सब्जी ,दाल पकाएँ। चूल्हे वाली रोटी खाएँ।। दूषित गैस नहीं बनती है। यदि लकड़ी घर में […]

बाल कविता

नन्ही चिड़िया

घास- फूस का नीड़ बनाकर, मेरे घर में रहती चिड़िया, दिन में दाना चुगती चिड़िया, रात में घर आ जाती चिड़िया। घर में रौनक़ लायी चिड़िया, बहुत प्यारी लगती चिड़िया, बहुत सबेरे चीं चीं करती, हम सब को जगाती चिड़िया। चिड़िया जब खुश हो जाती है, उसी नीड़ पर अण्डे देती , अण्डे से जब […]

बाल कविता

बालगीत – साबुन

घिस – घिस छोटा मैं होता हूँ। मैल तुम्हारा मैं धोता हूँ।। तरह – तरह के रँग हैं मेरे। महक ताजगी भरी बिखेरे।। कभी न मैला मैं होता हूँ। मैल तुम्हारा धोता हूँ।। सब ही मुझको साबुन कहते। सस्ते – मँहगे भी हम रहते।। कभी नहीं मैं तो सोता हूँ। मैल तुम्हारा मैं धोता हूँ।। […]

बाल कविता

मिलजुल के सीखो रहना जी

ये जीवन है एक लड़ाई,इसमें होती हाथापाई। जीतोगे तो ताज मिलेगा ,हारोगे तो मिलेगी खाई। वैसे तो मिलते कम मौके, पर जब पाओ करो भलाई। खुशियों के रंगीन चमन में,आग लगाती नफरत ताई। दुनिया के मेले में अक्सर,अच्छों में भी दिखी बुराई। मिलजुल के सीखो रहना जी,इसमें सबकी होय भलाई। — महेंद्र कुमार वर्मा