पद्य साहित्य बाल कविता बाल साहित्य

माँ

मेरा दु:ख, माँ का दु:ख मेरी खुशी, माँ की खुशी चोट मुझे लगती है मेरी माँ रो पड़ती हैं। खाना मैं खाता हूँ माँ तृप्त हो जाती हैं। मुझे सुलाकर ही सोती हैं पर वे ही सबेरे जगाती हैं। मेरे हर मर्ज की दवा मेरी माँ ही होती हैं। ईनाम मैं पाता हूँ माँ खुश […]

बाल कविता

संगीत

(अंतर्राष्ट्रीय संगीत दिवस 21 जून पर विशेष) संगीत है जीवन की परिभाषा, जीने की एक अभिलाषा, संगीत है आत्मा, संगीत परमात्मा, मन को सुकून देकर करे अवसाद का खात्मा. संगीत जग का है वरदान, संगीत एक कला है महान, संगीत धीर भी है गंभीर भी है, संगीत प्यासे का नीर भी है, मां मुझको एक […]

बाल कविता

बालगीत “चौमासे ने अलख जगाई”

रिमझिम-रिमझिम पड़ीं फुहारे।बारिश आई अपने द्वारे।।—तन-मन में थी भरी पिपासा,धरती का था आँचल प्यासा,झुलस रहे थे पौधे प्यारे।बारिश आई अपने द्वारे।।—आँधी आई, बिजली कड़की,जोर-जोर से छाती धड़की,अँधियारे ने पाँव पसारे।बारिश आई अपने द्वारे।।—जल की मोटी बूँदें आयी,चौमासे ने अलख जगाई,खुशी मनाते बालक सारे।बारिश आई अपने द्वारे।।—अब मौसम हो गया सुहाना,आम रसीले जमकर खाना,पर्वत से बह […]

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वीर बहूटी – बालगीत

वीरबहूटी कहलाती हूँ। छूते ही शरमा जाती हूँ।। लाल रंग मखमल-सी काया। जिसने देखा रूप सुहाया।। रेंग – रेंग कर मैं जाती हूँ। वीरबहूटी कहलाती हूँ।। जब अषाढ़ में बादल घिरते। धरती पर जल वर्षा करते।। भूतल के ऊपर आती हूँ। वीरबहूटी कहलाती हूँ।। बच्चे मुझे प्यार करते हैं। छू -छू कर मुझसे डरते हैं।। […]

बाल कविता

अपनी धरती

  कहते हैं सब कि … अपनी “धरती” रहने लायक अब बची ही नहीं । तो… हे कोलंबस ढूंढो नई दुनिया हो चारों तरफ जिसमें हरियाली । प्रकृति का वास हो जिसमें फैली हो… चहुंओर खुशहाली।। “बढ़ता धुँआ बढ़ती आबादी और व्यर्थ में पानी कि बर्बादी” – की चिंता रहित रहित ढूंढो संसार जहाँ बसाएंगे […]

बाल कविता

बाल कविता – बनें कोरोना विजेता

कोरोना है बड़ा खुर्राट लॉक हो या अनलॉक बेजरूरत ना निकलो घर से अपनी सुरक्षा अपने हाथ हाथ में हो सदा एक मास्क नहीं तो एक हो बड़ा रुमाल चेहरा न हो उघड़ा बाहर अपनी सुरक्षा अपने हाथ दादाजी हों या हों नानाजी दादीजी हों या हों नानीजी छोटे बच्चों करो ना हठ परेशान हैं […]

बाल कविता बाल साहित्य

नीली साड़ी

मम्मी जी की नीली साड़ी। लगती बहुत सजीली साड़ी। जगह जगह पर मोर सजे हैं। रंग सुनहरी छोर सजे हैं। अमिया के बूटों से सज कर, दिखती बहुत रसीली साड़ी। कपड़ा उसका रेशम रेशम। पल्लू देखो भारी भरकम। अक्सर फिरती मम्मी के संग, जैसे कोई सहेली साड़ी। मैं जब घर घर खेला करती। साड़ी पहन […]

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जल संरक्षण

जल संरक्षण अभियान चलाओ देश में पानी की बचत कराओ नदियाँ और तालाब में कुएँ में और नहर में टंकी में और गड्ढे में इनमें पानी की बचत कराओ पानी अपने काम में लो ना कि यूँ ही फेंकते रहो नदियाँ नहरें कुएँ तालाब हैंडपंप टूयूबैल इन सबसे हमें पानी मिलता अगर तुम यूँ ही […]

बाल कविता

बालकविता “पेड़ों पर पकती हैं बेल”

जो शिव-शंकर को भाती हैबेल वही तो कहलाती है—तापमान जब बढ़ता जातापारा ऊपर चढ़ता जाता—अनल भास्कर जब बरसातालू से तन-मन जलता जाता—तब पेड़ों पर पकती बेलगर्मी को कर देती फेल—इस फल की है महिमा न्यारीगूदा इसका है गुणकारी—पानी में कुछ देर भिगाओघोटो-छानो और पी जाओ—ये शर्बत सन्ताप हरेगातन-मन में उल्लास भरेगा—(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

बाल कविता

घोड़ा

घोड़ा एक पालतू जानवर, मदद हमारी खूब करे, तांगे में जुतकर यह घोड़ा, एक बार भी उफ़ न करे. काम सवारी के आता है, रेस लगाए, जंग लड़े, सर्कस में भी खेल दिखाए. स्वामिभक्त, जब वक्त पड़े.