शिशुगीत

पापड़

पापड़वाला जब कहता है, ‘पापड़ ले लो’, ‘पापड़ ले लो’, मैं ममी से तब कहता हूं, ‘पैसे दे दो’, ‘पैसे दे दो’. खस्ता-खस्ता पापड़ लेकर, खूब मजे से खाता हूं, पर फिर जब मिर्ची लगती है, ‘पानी-पानी’ चिल्लाता हूं.

शिशुगीत

टाईगर

विश्व बाघ दिवस (29 जुलाई) के अवसर पर विशेष   टाई नहीं लगाता फिर भी, टाईगर है मेरा नाम, शेर है भाई, वन में रहता, बस शिकार का करता काम. मेरी प्यारी-प्यारी धारियां, बन जाती हैं मेरी दुश्मन, इसीलिए छिपता-फिरता हूं, वरना रहता मैं स्वतंत्र मन.

शिशुगीत

तितली

तितली रानी, तितली रानी, लगती हो तुम बड़ी सयानी, रंग-रंगीली, प्यारी-प्यारी, लगती हो तुम जग से न्यारी. मुझको तुम अच्छी लगती हो, पर तुम दूर-दूर भगती हो, मुझको भी उड़ना सिखला दो, फूलों-सा हंसना सिखला दो.

शिशुगीत

चंद्रग्रहण

पापा बोले ”चंद्रग्रहण है, मैंने पूछा, “वो क्या होता पापा?” पापा बोले, ”आओ बताऊं, बताते मुझे थे मेरे पापा. एक सीध में आ जाते जब, सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा, पृथ्वी की छाया पड़ने से, थोड़ा-सा छिप जाता चंद्रमा.” तब यह चंद्रग्रहण कहलाता, खगोल घटना से इसका नाता, जब यह छाया हट जाती है, चंद्रमा पूरी […]

शिशुगीत

गुरु

         (5 जुलाई, 2020 को गुरु पूर्णिमा के अवसर पर विशेष) गुरु दीपक गुरु सूर्य हैं, गुरु ज्ञान-उजियार, अंधेरा-अज्ञान दूर कर, करते हैं उपकार. ब्रह्मा-विष्णु-महेश गुरु, गुरु प्रेम की खान, मात-पिता औ’ गुरु की सीख से, शिष्य भी बन जाता महान.

शिशुगीत

कबूतर

मेरी ममी मुझे पढ़ातीं, ‘क’ कबूतर कहना सिखातीं, मैं कहता तब ”कहां कबूतर?”, ”वह तो है घोंसले के अंदर. गुटरूं-गूं-गूं करता है, प्यारा-प्यारा होता है, खूब काम का पक्षी है यह, कुशल डाकिया होता है.”

शिशुगीत

चिड़िया

चिड़िया मुझको अच्छी लगती, देता मैं उसको दाना, फुदक-फुदककर आती है वह, खाती है अपना खाना. खाना खाकर उड़ जाती है, कभी नहीं करती टाटा, याद बड़ी उसकी आती है, लगता जब मुझको चाटा.

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तोता

तोता है इक प्यारा पंछी, हरे रंग का होता है, लाल चोंच है इसकी प्यारी, जो भी रटाओ रटता है. मिर्ची खाता खूब मजे से, टैं-टैं-टैं-टैं करता है, बच्चों का है प्यारा साथी, पर बिल्ली से डरता है.

शिशुगीत

सूर्य ग्रहण

मम्मी कहतीं सूर्य ग्रहण है, मुझको यह पर समझ न आता,                              सूर्य गज़ब का शक्तिशाली, उसे ग्रहण क्यों कर है लगता? ”सूर्य-पृथ्वी मध्य जब आए चंद्रमा, सूर्य है आच्छादित हो जाता, खगोल शास्त्रीगण सब कहते हैं, ”सूर्य ग्रहण” तब है कहलाता.

शिशुगीत

कौआ

कौआ काला होता है, कांव-कांव कर रोता है, चोरी करना इसे सुहाता, एक आंख का होता है. एक दिवस मेरे घर आया, मेरी रोटी ले भागा, मैंने भी तब खूब चिढ़ाया, ”जा, जा, तू है काला कागा.