भाषा-साहित्य

हिंदी…माथे पे बिंदी

**हिंदी…माथे पे मेरे मुझे बिंदी पसन्द है…अंग्रेजी से ज्यादा मुझे हिंदी पसन्द है…** हिंदी केवल एक भाषा ही नहीं हमारी मातृभाषा है,यह केवल भावों की अभिव्यक्ति मात्र न होकर हृदय स्थित सम्पूर्ण राष्ट्रभावों की अभिव्यक्ति है।हिंदी हमारे अस्मिता का परिचायक , संवाहक और रक्षक है।हिंदी भाषा का महत्व भारतेंदु हरिश्चन्द्र के इस कथन से लगाया […]

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मातृभाषा को संभालने की जरूरत

यूनेस्को ने 21 फरवरी को ‘मातृ भाषा दिवस’ मनाने का निश्चय करने के बाद भारत सरकार ने  भी  इसका फरमान जारी किया है और इसके आयोजन के निर्देश दिए हैं. शैक्षिक संस्थानों द्वारा आयोजित किए जाने वाले कृत्यों की सूची में अब यह भी शामिल है. ऐतिहासिक रूप से यह दिन पड़ोसी बांग्ला देश में […]

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वर्त्तमान परिपेक्ष्य में साहित्यकारों का दायित्व

आज हमारे समाज की स्थिति प्राचीन समाज की स्थिति से बहुत ही भिन्न हो चुकी है क्योंकि हम सब प्राचीन परंपराओं तथा प्राचीन सामाजिक नियमों को भूलते चले जा रहें हैं जिसके परिणामस्वरूप हमारा समाज भी परिवर्तित होता जा रहा है अगर किसी भी समाज में परिवर्तन की दर इसी तरह बढती गयी तब हमारा […]

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मातृभाषा होती है महान !

मातृभाषा मिश्री सी मीठी होती है। महाभारत की तरह मधुर, रामायण की तरह रसीली, गीता की तरह गुनगनाने योग्य होती है। मातृभाषा में बोलना – सोचना – लिखना – पढ़ना सब कुछ सरल लगता है। मातृभाषा के बारे में महात्मा गांधी जी ने कहा है, “ जैसे बच्चों के विकास के लिए मां का दूध […]

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असली साहित्य और साहित्यकार

कबीर, प्रेमचंद, भारतेंदु हरिश्चंद्र, गोर्की, लियो टॉलस्टॉय, तुर्गनेव, दोस्तोवयस्की, गोगोल, विलियम शेक्सपियर, शहीद-ए-आजम स्वर्गीय भगत सिंह, शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी, जयशंकर प्रसाद, हरिशंकर परसाई, कैफी आजमी, पाशा, वशीर बद्र, वसीम बरेलवी, जावेद अख्तर, अली सरदार जाफरी, गुलजार, निदा फ़ाजली, फैज अहमद फैज, फ़िराक़ गोरखपुरी, साहिर लुधियानवी, मुनव्वर राणा, राहत इंदौरी, अदम गोंडवी, विद्रोही आदिआदि लोग […]

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साहित्य बनाम प्रसिद्धि

विचारों के अंतर्द्वंद से फूटता है; भावनाओं का ज्वालामुखी। निकलता है शब्दों का गर्म लावा; बिखर जाता है कागज के धरातल पर स्याही की तरह और जन्म लेती है…… एक कविता ,कहानी या गज़ल।। ——   कल्पना सृष्टि में व्याप्त समस्त प्राणियों में केवल मनुष्य ही ऐसा जीव है जिसके पास अपनी अनुभूतियों, भावों एवं विचारों […]

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साहित्य ही समाज को गढ़ता है

समाज का ऐसा कोई वर्ग नहीं है जो कभी न कभी, किसी न किसी रूप में साहित्य के किसी न किसी विधा के संपर्क में न आया हो। इतिहास से लेकर अब तक की बात करें तो भित्तिचित्र ,शिलालेख ,मिट्टी और काँसे के बर्तनों पर उकेरे चित्र, पत्तों पर लिखे शब्द ,लोक संगीत ,देववाणी ,सत्संग […]

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त्रिपुरा का भाषिक परिदृश्य

त्रिपुरा पूर्वोत्तर का छोटा पर सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण राज्य है I महाभारत तथा पुराणों में भी त्रिपुरा का उल्लेख मिलता है I ‘त्रिपुरा’ नाम के संबंध में विद्वानों में मतभिन्न्ता है । इसकी उत्पत्ति के संबंध में अनेक मिथक और आख्यान प्रचलित हैं । कहा जाता है कि राधाकिशोरपुर की देवी त्रिपुरसुंदरी के […]

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नागालैंड का भाषिक परिदृश्य और नागामीज का भविष्य

नागालैंड पूर्वोत्तर भारत का एक प्रमुख राज्य है I यह असम की ब्रह्मपुत्र घाटी और बर्मा के बीच पर्वतीय क्षेत्र की संकरी पट्टी में स्थित है I इसके पूर्व में म्यांमार की अंतराष्ट्रीय सीमा, दक्षिण में मणिपुर, उत्तर और पश्चिम में असम एवं उत्तर- पूर्व में अरुणाचल प्रदेश राज्य स्थित है I यहाँ 16 प्रमुख […]

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पूर्वोत्तर राज्यों में भाषिक प्रावधान और हिंदी का परिदृश्य

भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र बांग्लादेश, भूटान, चीन, म्यांमार और तिब्बत – पांच देशों की अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर अवस्थित है । असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम- इन आठ राज्यों का समूह पूर्वोत्तर भौगोलिक, पौराणिक, ऐतिहासिक एवं सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है । इस क्षेत्र में 400 समुदायों के लोग रहते […]