सामाजिक

प्यार क्या है ?

आज प्यार के ही बारे में जानने की जरूरत है प्यार आखिर होता क्या है? कहते हैं कि प्यार बहुत ही खूबसूरत एहसास है।खूबसूरत इसलिए कि आप लोग लेना नहीं सिर्फ देना सीखते हैं।हम जिससे सच्चा प्यार करते है उसके जीवन में हमेशा खुशियाँ देखना चाहते हैं चाहे वह अपना बन पाए या नहीं दर […]

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दहेज प्रथा

आजकल नारियों पर इतना अत्याचार देखने को मिल रहा है कि कहा नहीं जा सकता। कहीं नारियां दहेज को लेकर कष्ट झेल रही हैं तो कहीं कुछ और, लेकिन आज मैं विशेष रूप से दहेज़ पर ही लिखने पर मजबूर हूँ। सरकार ने दहेज प्रथा को रोकने के लिए कई कनून चलाए। कहा गये वो […]

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बेटियों को मुखाग्नि का अधिकार क्यों नहीं …

” यह कहना शायद सही होगा कि सबसे ज्यादा बदलाव लाने की जरुरत दो जगह पर है – औरोतों के बारे में आदमियों की सोच और औरतों के बारे में खुद औरतों की सोच। ” ये विचार वेरा ब्रिटेन जी का है। और यह उतना ही सच है कि औरत को पुरुष से ज्यादा औरत […]

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विचार शक्ति

हमारा व्यक्तित्व विचार और चिन्तन से बनता है। यह जीवन भर के चिन्तन और समस्त विचारों का प्रतिफल होता है। हम विचारों के द्वारा ही उन्नति कर जीवन के उच्चतम लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। जीवन वैसा ही होता है जैसा हमारे विचार उसे बनाते हैं क्योंकि यह विचारों का दर्पण है। इस प्रकार विचार […]

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उत्तराखण्ड में वेद प्रचार और इसकी प्रमुख ऐतिहासिक आर्य संस्थायें

उत्तराखण्ड भारत का एक प्रमुख सीमान्त राज्य है जिसकी स्थापना 9 नवम्बर, 2000 को हुई। राज्य की स्थापना से पूर्व यह उत्तर प्रदेश राज्य का अंग होता था। इसका पूर्व नाम सयुंक्त प्रान्त था। उत्तराखण्ड में वेद प्रचार का श्रेय महर्षि दयानन्द व उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज के निष्ठाावन विद्वानों व प्रचारकों को है। […]

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शिष्टाचार

“ सत्य बोलना ही देवलोक असत्य बोलना ही मर्त्यलोक आचार ही स्वर्ग, अनाचार ही नरक ॥“ ये बातें आचार और शिष्टाचार के संदर्भ में बारहवीं शताब्दी के महामानव श्री बसवेश्वर की हैं। शिष्टाचार का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग ही सत्य बोलना है। ’शिष्टाचार’ शब्द की उत्पत्ति एवं विकास ही प्राचीन काल से हुआ है किन्तु इस […]

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साहित्य और समाज

“समाज नष्ट हो सकता है, राष्ट्र भी नष्ट हो सकता है, किन्तु साहित्य का नाश कभी नहीं हो सकता।“ ये उक्ति महान विद्वान योननागोची की है। जिससे हम साहित्य की महत्ता को जान सकते हैं। साहित्य कहते ही हमारे दिमाग में खयाल आता है कि किताब, ग्रंथ आदि का भंडार। और समाज के बारे में […]

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धर्म, मत-मतान्तर और भूख

धर्म और भूख में क्या परस्पर कोई सम्बन्ध है? हां, अवश्य है, कम से कम भारत में तो रहा है और अब भी है, ऐसा स्पष्ट प्रतीत होता है। धर्म दो प्रकार के हैं एक तो वास्तविक, यथार्थ या सत्य धर्म है जो संसार के सभी लोगों के लिए एक समान है, इसलिए वह सबका […]

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पुरुषार्थ

जिन कार्यों को करने से हमारे प्रयोजन सिद्ध होते हैं वे पुरुषार्थ कहलाते हैं। वेदादि शास्त्रों में मनुष्य के करने योग्य चार पुरुषार्थ बताए गए हैं- धर्म अर्थ, काम और मोक्ष। धर्मपूर्वक धन प्राप्त करने हेतु परिश्रम करना आर्थिक पुरुषार्थ है। ईश्वरीय सृष्टिक्रम में हमें निरन्तर कर्म करने की शिक्षा मिलती है। हम जिस पृथ्वी […]

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मैं महर्षि दयानन्द का ऋणी हूं

आजकल देश में बेटी बचाओं आन्दोलन आरम्भ हुआ है। माता के गर्भ में पल रही बेटियों को जन्म लेने से पूर्व ही मार दिया जाना इस आन्दोलन का कारण है। इसी पृष्ठ भूमि में हमारे बन्धुओं की विकृत मानसिकता और सामाजिक परिस्थितियां हैं। इसका एक अन्य कारण यह भी है कि हमारे देश में लाखों […]