हास्य व्यंग्य

खट्टा-मीठा : लड़की नहीं, लड़ती हूँ

कोई पचपन साल की अधेड़ औरत यदि खुद को लड़की कहे, तो उस पर हँसी से ज़्यादा तरस आता है। दादी-नानी बनने की उम्र में लड़की बनने का शौक़ चर्राया हो, तो ब्यूटी पार्लर वाली भी आत्महत्या कर लेंगी। “सींग कटाकर बछड़े बनने” का मुहावरा ऐसे ही उदाहरणों से निकला होगा। वैसे औरतों के लिए और विशेषकर अधेड़ उम्र की औरतों के लिए लड़ना कोई अजूबा नहीं है। इसका नजारा रोज़ ही आप किसी बस्ती के सार्वजनिक नल पर देख सकते हैं। “पहले मैं भरूँगी-पहले मैं भरूँगी” के वाक् युद्ध के साथ-साथ हाथ नचा-नचाकर जो महायुद्ध होता है, उसको देखकर बस्तीवालों का अच्छा मनोरंजन हो जाता है, वह भी बिना टिकट। औरतों की इस लड़ाका-क्षमता का सही सदुपयोग राजनैतिक दल ही कर पाते हैं। वे अपनी रैली के दिन दिहाड़ी पर ऐसी औरतों को इकट्ठा कर  ले जाते हैं, फिर वे किसी सरकारी कार्यालय के सामने […]

हास्य व्यंग्य

डिजिटाइज्ड सरपंचजी

ग्राम्यांचल में वहाँ के स्थानीय विवाद निपटाने के लिए किसी मौजे की एक ग्राम -पंचायत होती है।एक मौजे में एक या एकाधिक गाँव होते हैं।ग्राम -पंचायत में पाँच गण्यमान्य व्यक्ति पंच चुने जाते हैं ,जिनका वहाँ विशेष सम्मान भी होता है। वही वहाँ के जज होते हैं।इसी प्रकार कई ग्राम -पंचायतों की एक न्याय पंचायत […]

हास्य व्यंग्य

दिल सूअर का …  (व्यंग्य)

जब भी कोई आज के विज्ञान की उन्नति की बात करता है तो उसकी बात काटने को कोई ना कोई हमारे यहाँ मौजूद मिल ही जाता है और वह बिना रुके, चलने वाली एक्सप्रेस ट्रेन की भाँति एक ही सांस में इतनी बातें उड़ेल देता है कि आज के विज्ञान का विकास सिकुड़ कर कौने […]

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हास्य-व्यंग्य : पिल्ला पीहर का

      यूँ तो जीव-प्रेम के लिए पूरा शहर जे पी को बखूबी जानता था। उन्हें  गली-मोहल्ले, यहाँ-वहाँ,  कहीं भी कोई खूबसूरत या दु:खी  जानवर या पक्षी मिल जाता तो वो उसे घर ले आते और पालते और उसकी देखरेख भी स्वयं जे पी को ही करनी पड़ती, कारण कि उनकी  इस आदत से […]

हास्य व्यंग्य

मेरे मानहानि का मामला

उस दिन आफिस की डाक देखते-देखते अचानक एक शिकायतनुमा पत्र पर मेरी नजर ठहर गयी! उसे एक ही झटके में पढ़ गया। दिमाग भन्नाया। घंटी दबाया और दबाता ही रहा। हड़बड़ाया चपरासी सामने आ खड़ा हुआ। कार्यालय सहायक को तत्काल हाजिर कराने का उसे फरमान सुनाया। कार्यालय सहायक आ‌ गए। उन्हें शिकायती पत्र पढ़ने के […]

हास्य व्यंग्य

चारण-पुराण

देश के इतिहास में एक समय ऐसा भी था,जो घोषित चारण – युग था। इसके विपरीत आज अघोषित चारण-युग है। प्राचीन चारण – युग में कवि रचनाकार कवि ही नहीं , राजाओं ,राज परिवारों और राजघरानों के अतिशयोक्ति परक चाटुकार ,पत्रकार औऱ अंधानुयायी भी थे।तिल का ताड़ बनाकर प्रशंसात्मक कविता कहना ,सुनाना और उनकी प्रशस्ति […]

हास्य व्यंग्य

दृश्यान्तर

दृश्य-1 मैं शहर हूँ।मुझे नगर अथवा सिटी भी कहा जाता है।बहुत बड़ा होने पर महानगर (मेट्रोपोलिटन सिटी) कह दिया जाता है।यह सब मेरे आकार पर निर्भर करता है। कुल मिलाकर हम सबकी संस्कृति औऱ सभ्यता एक ही है।विकासशील बस्तियाँ टाउन या कस्बे बोली जाने लगती हैं। ज्यों-ज्यों मैं बड़ा होता जाता हूँ ,मैं आत्मकेंद्रित होता […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग लेख – नेता पुत्रों का राजनीतिकरण

बचपन में किसी क्लास में पढ़ा था ” पढ़ लिख कर मैं एक किसान बनूंगा ” शायद तब देश में लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री थे । उनका नारा ” जय जवान जय किसान ” का उस पर असर रहा होगा । गांव चौपालों में भी यह बात खूब कही जाती थी कि किसान का बेटा किसान […]

हास्य व्यंग्य

खट्ठा-मीठा : अनाम आत्म-बलिदानी

किसान आन्दोलन के नेताओं को रंज है कि एक वर्ष से भी अधिक चले इस आन्दोलन में 700 किसानों का बलिदान हो गया, पर सरकार ने उनकी कोई सुध नहीं ली। मैं उन नेताओं की बात पर अविश्वास नहीं करता। हालांकि वे 700 तो क्या 7 किसानों के नाम भी नहीं बता पाये, जो वहाँ […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग्य – नींद

बहुत दिनों बाद आज कुछ सोचते सोचते अच्छी नींद आ गई।जब नींद अच्छी हो तो सपने का आना तो तय ही हैं।सपने में ही सही करोना के डर से बाहर जाने से डरने वाली मैं बाहर जाने के लिए तैयार होने लगी।अच्छी जींस और टॉप पहन सड़क के किनारे सवारी की खोज में खड़ी हो […]