हास्य व्यंग्य

व्यंग्य लेख : प्लास्टिक-युग

कौन कहता है कि यह कलयुग है? जी नहीं ,आपके कलों के युग कलयुग को प्लस्टिक ने अपने आगोश में छिपा लिया है। जहाँ देखें वहाँ प्लास्टिक ही छाया है। ये युग क्या है , प्लास्टिक की माया है। प्लास्टिक की काया है। सब कुछ प्लास्टिक में समाया है।सब पर प्लास्टिक की छाया है।हर आदमी […]

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व्यंग्य – कुर्सी का कमाल 

भारतीय लोकतंत्र काफी आगे बढ़ चुका है। कुर्सी प्रधान राजनीति में कुर्सी की खींचतान जारी है। कुर्सी का सपना देखना हर भारतीय टोपीधारी का जन्मसिद्ध अधिकार है। कुर्सी के प्यार में अंधे प्रेमियों को कुछ नहीं दिखता। वे हर हालात में कुर्सी को हथियाने के लिए उत्सुक नजर आते हैं। कुर्सी का इतिहास बताता है […]

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व्यंग्य – वैलेंटाइन्स डे की वायु  

आज दुनिया ‘शॉर्टकट के सिद्धांत’ पर चल रही है। दिनोंदिन व्यस्त होते लोगों को कतार में खड़े रहना पसंद नहीं हैं। कतार के अंत में खड़ा व्यक्ति भी ‘विटामिन एम’ और ‘शॉर्टकट के सिद्धांत’ के सफल गठबंधन के तहत अपना काम सबसे पहले करवाने की योग्यता रखता है। महंगाई के बढ़ते दौर में इंसान की […]

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व्यंग्य- सोशल मीडिया पर समाज सेवा

वो एक समाजसेवी थे, समाजसेवी के साथ पशु प्रेमी भी जुड़ा है, उनका समाजसेवा बड़े-बड़े बैनर पोस्टर और समाचार के हेडलाइंस पर होते थे। टीवी डिबेट वाले अक्सर उन्हें बैठाकर सामाजिक मुद्दे पर चर्चा करवाते हैं। दिल्ली के बड़े-बड़े पार्टी में उन्हें अक्सर देखा जा सकता, उनका अच्छे-अच्छे लोगों से पहुंच था, शहर में करोड़ों की प्रापर्टी दबाकर रखा है। उस […]

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व्यंग- विचारधारा की लड़ाई

नेताजी का चुनाव चल रहा था भाषणबाजी सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा था, नेताजी अपने निर्वाचन क्षेत्र में जगह-जगह विपक्ष को कोस रहे थे। कुछ टीवी समाचार वालों ने सोचा क्यों नहीं अमेरिका की तरह यहां पर डायरेक्ट प्रत्याशीयो का डिबेट हो जाए तो कितना अच्छा रहता। एक बड़े मैदान में मंच लगा वहां पर तमाम […]

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व्यंग्य : कलयुग की छलयुग से खुसर-पुसर

आपका तो मुझे नहीं पता …! लेकिन हमें हमारे शिक्षकों ने बचपन में पढ़ाया था कि “रामचंद्र कह गये सिया से ऐसा कलयुग आयेगा,हंस चुगेगा दाना कौआ मोती खायेगा” शिक्षकों पर हमने भरोसा कर लिया।करना भी चाहिए था। उस समय लोग शिक्षकों पर भरोसा ही किया करते थे। हमें भी लगा कि चलो हम द्वापर,त्रेता,सतयुग […]

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व्यंग्य – मैं और कीड़ा

कहते हैं मनुष्य के दिमाग में एक कीड़ा होता है, जो समय-बेसमय पर उसे काटता रहता है। उस दिन कीड़े ने मुझे काटा और पूछा-“क्यों रे मानव खोपड़ी, ये मिलावट क्या होती है? तू इस पर विश्वास करता है?” मैंने कहा-”भैया मेरे, मिलावट पर विश्वास न करना भगवान पर अविश्वास करने के समान है। बिना […]

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हम नंबर वन थे और हैं

दिल में आया कि आपको फोन करके नववर्ष की शुभकामना दूं। तभी दूसरा प्रश्न दक्ष हो गया कि आपने मुझे शुभकामना नहीं दी फिर मैं आपको शुभकामना क्यूँ दूं? वैसे भी नववर्ष की शुभकामना देना या लेना यह ढोंग हम ना जाने कब से करते आ रहे हैं। मार्डन युग में नया साल मुबारक हो […]

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लोकतांत्रिक ढेले

आजकल देश को सही मायने में विशुद्ध लोकतांत्रिक बनाने के लिए ढेलेबाजी की जरूरत महसूस की जा रही है, ऐसा क्यों? क्योंकि यह एक प्रकार की सेक्युलरिज्म की भी अभिव्यक्ति है। वैसे तो इसके अभिव्यक्ति के कई तरीके हैं, लेकिन अन्य तरीके पुराने पड़ने के साथ अप्रभावित टाइप के हो रहे थे। कोई भी लोकतांत्रिक […]

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प्याज प्याज प्याज

न्यूज चैनल पर प्याज बिक रहा है, टीवी एंकर कामेडी शो माफ करिये, प्याज की मार पर डिबेट चल रहा था। समस्त पार्टी के प्रवक्ता बैठकर अपनी बात को रख रहे थे, एंकर साहब बीच में सुर में सुर मिला रहे है, पक्ष- प्याज को बदनाम करने के लिये माफ करिये सरकार को बदनाम करने के विपक्ष […]