हास्य व्यंग्य

हिंदी साहित्य के इतिहास में तालाबंदी काल

हिंदी साहित्य के इतिहास पुनर्लेखन का समय फिर से एक बार निकट आता दिखाई दे रहा है। वीरगाथा काल से शुरु होकर भक्ति काल, रीति काल और आधुनिक काल तक लिखे गये इतिहास में अब तालाबंदी (लॉकडाउन) काल को जोड़ना पड़ेगा। लॉकडाउन का सही उपयोग किसी ने किया तो वह हिंदी के रचनाकारों ने किया। […]

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टिड्डी- एक रोचक कीड़ा

टिड्डी- हरा रंग का एक कीड़ा। मासूम सा दिखने वाला एक कीड़ा। मैं प्रकृति प्रेमी हूँ अतः मुझे हर प्राकृतिक वस्तु जीव जंतु बहुत प्यारे लगते हैं। इसके बावजूद एक सुबह मैं एक टिड्डी को भगाने दौड़ा। कृषक पुत्र हूँ अतः मुझे अच्छी तरह से मालूम है कि मासूम सा दिखने वाला यह कीड़ा बहुत […]

इतिहास हास्य व्यंग्य

दोस्त के नाम अर्ज

प्रिय मित्र, सादर नमस्ते ! संभवतः, हमदोनों एक-दूसरे को तब से जान रहे हैं, जितनी भाभी की उम्र भी नहीं होगी ! फ़ोन पर भाभी से अबतक एकाध बार ही बातें हुई होंगी ! यह तो जानते ही होंगे कि देश के सभी कार्यालय डेस्क पर सहकर्मियों के बीच पारिवारिक प्रतिबद्धताओं से लेकर राजनीतिक बातें […]

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2018 : ए हेट स्टोरी (व्यंग्य)

★एक ‘नियोजित संवाददाता’ (एक ‘नियोजित शिक्षिका’ से):- अंग्रेजी दिनों के नाम ‘ब्लैक बोर्ड’ पर लिखिए ? ◆नि. शिक्षिका:- क्यों ? एक शिक्षक से इस ढंग से बात की जाती है! ★नि. संवाददाता:- आप तो नियोजित हैं, वो वाली नहीं हैं! ◆नि. शिक्षिका:- ऐसी बात है, तो सुन लीजिए… सन्डे, मंडे, अंडे, डंडे, रंडे, झंडे, लौंडे…. […]

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ऑनलाइन : तब और अब

सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने एक डायलॉग किसी फिल्म में बोला था जो इस प्रकार है – “हम जहाँ खड़े होते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है।” सोचो अगर यही डायलॉग समर्थ अभिनेता ए. के. हंगल साहब ने बोला होता तो कैसा लगता..? खैर …बात यह नहीं है, यह तो यूँही परिहास में […]

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व्यंग्य : समय की यात्रा आदमी का भ्रम 

महाभारत सीरियल जब आरंभ होने को होता तब एक प्रभावी ध्वनि ध्वनित होती ” मैं समय हूँ ,, अर्थात एक अदृश्य सत्ता जिसे हम भगवान कहते हैं अपने को समय रूप में भी संसार को बतलाना चाहती हैं । ये सब रही अध्यात्म की बातें जिसे श्रेष्ठ बुद्धि संपन्न व्यक्ति ही समझ सकता है सामान्य […]

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व्यंग्य : नाजायज़ औलाद

इन दिनों मुझे हर व्यक्ति में कोरोना दिखता है। लगता है कोरोना ब्रह्म है जिसका वास हर जीव में है। चीनी कोरोनामय सब जग जानी। इसके सम्मान मे लोग गले नहीं मिलते। हाथ नहीं मिलाते। करत प्रनाम जोरि जुग पानी। अजीब रहस्यवाद है भाई। न ब्रह्म जीव से मिलने को व्याकुल है ना जीव ब्रह्म […]

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लेखक-संपादक-संवाद

आदरणीय संपादक महोदय, सुप्रभातम ! आशा है, आप स्वस्थ व सानंद रहकर लॉकडाउन का अनुपालन कर रहे होंगे ! मैंने इधर पत्रिका में प्रकाशन हेतु कई रचनाएँ प्रेषित की है, किन्तु एक भी प्रकाशित न होना विस्मित करता है ! यह सुयोग्य नहीं है क्या ? आपके एतदर्थ उत्तर भी अप्राप्त है । मैं संपादकत्व […]

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व्यंग्य : दादा ने दारू पीकर निभाया अपना राष्ट्र धर्म

डिनर करने के बाद हम प्रतिदिन की तरह बॉलकनी में बैठे बैठे मोबाइल पर फेसबुक नोटिफिकेशन देख रहे थे तभी नीचे एक  बाइक  के रुकने की आवाज आई। गली की स्ट्रीट लाइट पिछले लगभग चालीस दिनों से खराब होने के कारण कौन आया है? यह पहचानने  में कठिनाई हो रही थी । नीचे से आवाज […]

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व्यंग्य – भेद बढ़ाते मंदिर-मस्जिद, प्रीत बढ़ाती मधुशाला

आज मुझे उन लोगों पर तरस आ रहा है जो मेरे मद्यपान से रुष्ठ रहते थे। मूर्ख कहीं के। वे राष्ट्र के प्रति मेरी सत्यनिष्ठा और भक्ति को नहीं समझ सके। उन्हें अब समझ में आ रहा होगा कि एक सैनिक युद्ध में सीने पर गोली झेलकर जो अपना कर्तव्य निभाता था, वही योगदान मेरी […]