Category : हास्य व्यंग्य


  • मूर्तियों के देश में !

    मूर्तियों के देश में !

    सबेरे-सबेरे सोकर उठा तो तरह-तरह के उवाचों और हो-हल्लों के बीच मैंने अनुमान लगा लिया कि हो न हो लोकतंत्र पर एक बार फिर कोई खतरा मँडरा रहा है..!! वाह भाई वाह..! अपने देश में लोकतंत्र...

  • कंगाली में आटा गीला

    कंगाली में आटा गीला

    वे भाग गए हैं। वे अपनी लुंगी धोती सब समेट के विदेश भाग गए हैं । आप कहते हैं कि अपनी एक एक पाई बसूल कर करेंगे । वे कहते हैं अपनी धोती भी न देंगे...

  • नानी का गांव

    नानी का गांव

    क्या हाल है भाई रमेश आज उदास लग रहे हो। घर में सब ठीक-ठाक है ना। हां भाई घर में तो सब ठीक ही है। फिर उदास क्यों हो घूरा ने पूछा, रमेश बहुत धीमी स्वर...


  • व्यंग्य – बाबाजी का बजट

    व्यंग्य – बाबाजी का बजट

    अवध में जैसे ही लाल सूटकेश खोला गया संपूर्ण वातावरण में धूप,गुगुल,अगरबत्ती की खुशबू फैल गई।भक्त रूपि जनता को नेपथ्य से शंख एवं घंटी की ध्वनि सुनाई देने लगी और सभी धर्म की वैतरणी में डूबने-उतरने...

  • माया महाठगिनी हम जानी

    माया महाठगिनी हम जानी

    सब कहते हैं-मंहगाई बढ़ गई। कितना सरासर झूठ कहते हैं। इन झूठों के मारे यदि कल शाम तक धरती रसातल में मिले तो आप अचरज न कीजिएगा। अब देखिए न कल तक जो सिगरेट का कश...


  • व्यंग्य – कहीं… नाक, न कट जाए?

    व्यंग्य – कहीं… नाक, न कट जाए?

    मानव शरीर में अत्यंत ‘अल्पसंख्यक’ होने के कारण नाक को आरक्षण की सुविधा मिली हुई है। वह कटती है और कभी ऊँची भी होती है। दिमाग और दिल भी नाक के समान अल्पसंख्यक वर्ग में ही...