नवीनतम लेख/रचना

  • यशोदानंदन-२६

    श्रीकृष्ण, भैया दाऊ और अपने मित्रों के साथ नियमित रूप से वन जाने लगे। वे चारागाह जाते, गाय-बछड़ों को स्वतंत्र विचरण करने के लिए छोड़ देते और स्वयं अपने संगी-साथियों के साथ भांति-भांति की क्रीड़ा करते;...

  • संस्कार

    संस्कार

    शाम का समय, बाजार में काफी चहल-पहल थी। कुछ लोग खरीदारी कर रहे थे, कुछ लोग वहीं खडे खोमचेवालों के पास खा रहे थे। सहसा सबका ध्यान एक तरफ से आ रही चिल्लाने की आवाज पर...



  • माँ 

    माँ 

    आज वही बात दोहराऊँगी , जो माँ ने मूझे समझाई थी ! पूछ लिया था , माँ से मैंने जब तूम नहीं रहोगी माँ मैं केसे जी पाऊँगी ! तुम्हारे बिना मैं मर जाऊँगी माँ बोली थी...

  • जातिवाद

    जातिवाद

    मित्रो, आज बहुत सी हिंदूवादी संस्थाये जाति और जातिवाद को बुरा कहती हैं (वो बात अलग है की ऐसे लोग स्वयं अपने नाम के पीछे जाति आधारित सरनेम लगाये घूमते हैं)। ऐसे लोग जाति को ठीक...


  • आखिर हम कहाँ जाएँ?

    आखिर हम कहाँ जाएँ?

    जब कांग्रेस यानी यु पी ए -२ का भ्रष्टाचार सर चढ़कर बोलने लगा और भरतीय जनता को मोदी नीत भाजपा से आशा बंधी, भारतीय जनमानस ने उन्हें अभूतपूर्व बहुमत दिया. केंद्र के साथ कई राज्यों में...


  • हम तुम्हारी ही परछाई है

    हम तुम्हारी ही परछाई है

    अर्धांगनी है तुम्हारी तुम्हारे साथ ही जीना-मरना है हम तुम्हारी ही परछाई है परछाई की तरह ही साथ रहना है जब जब तुम लड़खड़ा कर गिरोंगे बढ़कर हम थाम लेंगे तुम्हें जो तुम देख नहीं पाओंगे...

कविता