नवीनतम लेख/रचना


  • क़त’आ

    क़त’आ

    भीगी  पलकें  सुखा  लिया हमने, दिल को पत्थर बना लिया हमने। सर्द आहों से सिल लिये लब को, रूप सादा  बना लिया  हमने। दाद कुछ दो कि किस क़रीने से, तेरी फितरत छुपा लिया हमने।

  • कविता

    कविता

    राँझना तुम्हे पता हैं अकेले बर्फ ही नही जमती वक्त भी जम जाता हैं हो जाता हैं सख्त चट्टानों की तरह जिस दिन तुम नजर नही आते अंधी हो जाती हूँ सबकुछ रुक जाता हैं मेरे...




  • बादल

    बादल

    काले बादल नभ में गरजते , रिमझिम -रिमझिम बरसते बादल , इस तप्त धरती को , शीतलता प्रदान करते बादल , इन बूंदा बूंदी फुहारो में , बच्चे नहाते आँगन में , शोर मचाकर , धूम...

  • मेरे सपने …

    मेरे सपने …

    काँटों भरी राहों पर फूल बिछाते चलूँ | अपने दुर्गम मार्ग को सुलभ बनाते चलूँ | अपने वाणी में मधुरस घोलते चलूँ | ये हैं मेरे सपने | अपने कर्तव्य से कभी विमुख न रहूँ |...


  • स्मृति के पंख – 40

    अनन्त राम को बाकी रुपया तो मैं अदा कर चुका था, सात सौ उसका बाकी रह गया था। जब मिलनी पर सुभाष और कमलेश जाने लगे, तो मैंने सुभाष को कह दिया कि बरेली में चाचा...

राजनीति

कविता