नवीनतम लेख/रचना

  • कविता

    कविता

    सुनो ! सुन रही हो !! अरे, वैसे ही कुछ घुमड़ रहा अन्दर, बताऊँ ? अच्छा सुनो ! अगर मैं नही रहा और, विस्थापित हो पहुँच गया, सुदूर तारों तक !! तो, तो भी क्या? रहेंगी...

  • मानव

    मानव

    मानव अब मानव नहीं रहा। मानव अब दानव बन रहा। हमेशा अपनी तृप्ति के लिए, बुरे कर्मों को जगह दे रहा। राक्षसी वृत्ति इनके अन्दर। हृदय में स्थान बनाकर । विचरण चारों दिशाओं में, दुष्ट प्रवृत्ति...


  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    उसका हर अंदाज जमाने वाला है। मुझको सबसे गैर बताने वाला है॥ लोगों की नजरों में मुफ़लिस बनता है, घर में देखा शख्स खजाने वाला है। उससे साँस उधारी हरगिज मत लेना, जो तुमसे अहसान जताने...

  • खुशबुओं  की   बस्ती

    खुशबुओं की बस्ती

      खुशबुओं की बस्ती में रहता प्यार मेरा है आज प्यारे प्यारे सपनो ने आकर के मुझको घेरा है उनकी सूरत का आँखों में हर पल हुआ यूँ बसेरा है अब काली काली रातो में मुझको...

  • वजहे-क़दीम

    वजहे-क़दीम

    इक तीर जिगर के पार गया, दिल जीत गया, दिल हार गया, हर काम से मन नाचार गया। इक तीर जिगर के पार गया….. इक इश्क की बाज़ी हार आए, इज़हार गया, इंकार गया, जो वक्त...

  • गज़ल

    गज़ल

    दरीचों से झांकता ऊजाला कहता है अब इस घर में कोई रहता है…… शाख़ पर फिर पत्ते आ गए हैं अब कोई परिंदा यहाँ बैठता है….. लबों पर कोई दुआ खेलती है अब सज़दे में सर...

  • डिपेंड कौन?

    डिपेंड कौन?

    “हाय” “हाय” “कैसी हो” “बढ़िया, आप कैसी हो” “मैं भी ठीक हूँ” “कहाँ रहती हो, आजकल दिखती ही नहीं?” “हाँ यार वो भाई की शादी है ना थोड़ी शॉपिंग में बिजी थी” “अच्छा पर ये क्या...

  • यूँ हीं

    यूँ हीं

    कोई भी किसी का अपमान या सम्मान कर अपने संस्कारों का परिचय देता है । धैर्य सबके हिस्से कहाँ खुदा देता है।। = आँख से टूट बंदनवार तनी बरौनी पर गम आँसू छोड़ पोली बांसुरी गुनगुनाने वाली...

राजनीति

कविता