नवीनतम लेख/रचना


  • धर्म के नाम पर

    धर्म के नाम पर

    काफी दिनों से पढ़-पढ़ कर पक गया हूँ… आखिर अब फूटने का वक़्त आ गया है… प्रश्न-धर्म आखिर है क्या? संभावित उत्तर– ‘अद्वैत लाइफ एजुकेशन’ के प्रमुख प्रशांत त्रिपाठी जी के अनुसार धर्म समझ है…बिलकुल सटीक...


  • लाज़वाब

    लाज़वाब

      मैं मानता हूँ तुम्हारे घर के आँगन के गमले में जैसे मैं हूँ एक खिला हुआ गुलाब पर तुम कहती हो तुम्हारे मन के आकाश में सूर्योदय का हूँ मैं सुनहरा आफताब तुम्हें मैं निरंतर...

  • चाहे-अनचाहे शब्द

    चाहे-अनचाहे शब्द

    चुप्पियाँ जब गूँज बनकर दिमाग में धमकने लगे और खामोशियाँ भी खुद से गुफ्तगू करने लगे तब मेरे लफ्ज़ मुझे राहत देते हैं अनजाने में अनचाहे शब्द भी जब कलम से निकलते हैं कुछ बहने लगता...


  • शब्द

    शब्द

    मैं शब्दों के साथ रहना चाहती हूँ और शब्द मेरे पहनती हूँ गहना भी शब्दों का वे ही तो पूरी करते हैं किताब मेरे सपनों की शब्दों के साथ हंसती ख़ुद को खोजती शब्दों के घर...

  • स्मृति के पंख – 10

    जब सोना 20-22 रू0 तोला था, पोंड की सरकारी कीमत थी 15 रुपये। अंग्रेज लोगोें की कोठी पर चैकीदार रात को डयूटी देने वाला उसे 15 रुपये महीना तनख्वाह थी। नवरोज, जो मेरा अच्छा दोस्त था,...

  • जागो हिन्दू !

    जागो हिन्दू !

    जागो हिंदू देखो क्या हो रहा धर्म परिवेश में हिंदू धर्म संकट में पड़ा है धर्म-निरपेक्ष देश में हमारा सनातन धर्म हिंदू है दुनिया में सबसे महान हमारे वेद-शास्त्रों से सिख लेता है सारा जहान हमारे...

  • कविता : तस्वीर

    कविता : तस्वीर

    खरोच देता हूँ आईने को खुद के हाथों से । मेरी तस्वीर के संग उस बेवफा की तस्वीर क्यों बनती है ???? मेरी आँखों ने जैसे दुनिया में कोई सूरत  न देखी हो । मेरे अश्क़...

राजनीति

कविता