नवीनतम लेख/रचना


  • जी लूं ज़रा

    जी लूं ज़रा

    गर तुम इजाजत दो तो खुश हो लूं ज़रा बैठ के तुम्हारे पहलू में हस लूं रो लूं ज़रा दिन जो बचे हैं जिंदगी के अब थोड़े से उन्हें तुम संग जी भर के जी लूं...

  • साहित्य और समाज

    साहित्य और समाज

    “समाज नष्ट हो सकता है, राष्ट्र भी नष्ट हो सकता है, किन्तु साहित्य का नाश कभी नहीं हो सकता।“ ये उक्ति महान विद्वान योननागोची की है। जिससे हम साहित्य की महत्ता को जान सकते हैं। साहित्य...

  • यादें

    यादें

    हे मन ! क्यों उदास है? क्या सोच रहा है? क्यों याद कर रहा है ?उसको उसका अभी -भी इन्तजार है , उसने क्या दिया था तुम्हें, खुशहाल भरे ओ पल, आनन्द भरी वो बातें, इजहार...

  • बसंत से…

    बसंत से…

    दरख्तों में निकल आए हरे हरे पत्ते नग्न शाखों ने पहन लिए हैं मखमली लत्ते (कपड़े) बसंत—- सहसा रखा तुमने जो कदम आरंभ हुआ नया जीवन——– कोमल कोमल वृंतों में देखो कैसे झुम रहे नाच रहे...

  • लहू के रिश्ते

    लहू के रिश्ते

    आग सुलगती है नफ़रत की मन मेंआँखे फिर भी झरती हैं!!कब्र खुदी है इंसानियत की ,मानवता आहें भरती है!!अपने वक्त का अनमोल खजाना,जिन रिश्तों पर था लुटाया!!वक्त क्या बदला ऐसे बदले,गिरगिट भी देख शरमाया!!आग सुलगती है...


  • उपन्यास : देवल देवी (कड़ी 26)

    23. धिक्कृत अभिलाषा मलिका-ए-हिंद (कमलावती) ने खुद को पूर्णरूप से सुल्तान के कदमों में निसार कर दिया। अलाउद्दीन ने उसे अपनी प्रमुख बेगम बनाया और कई दास (पुरुषांग कटे हिजड़े), दासियाँ उसकी खिदमत में लगाई। कमलावती...

  • ग़ज़ल : शबनम

    ग़ज़ल : शबनम

      ख़ुशबू से कह दो फैले यहाँ इख़्तिसार में, शहज़ादीमहव-ए-ख़्वाबहै टूटे मज़ार में। शबनम भी आंसुओ की तरह गुल पे छा गई, कोई उदास कर गया फ़स्ल-ए-बहार में। ग़म हाथ बांधे सर को झुकाए हैं हर...

  • तीन कवितायें

    तीन कवितायें

    (1) कहीं ले कर ना उड़ जाना मेरे होंसलों को तुम तुम वक़्त के परिन्दे  हो कभी तुम ज़मीं पर और कभी आसमान में उड़ते हो (2) उम्मीदों को कोई सरोकार नहीं होता तुम्हारी भावनाओं से...

राजनीति

कविता