नवीनतम लेख/रचना



  • बचपन

    बचपन

    बाल दिवस पर विशेष  कितने प्यारे होते हैं बचपन के वो दिन सब संग हंसना खेलना मिलते ही दोस्त बना लेना न दुनियादारी की चिंता न अपने-पराये का भरम वहीं लड़ना वहीं माना जाना छुपम-छुपाई ,...



  • जन्मदिन

    जन्मदिन

    ये लो नये कपड़े और कल जल्दी उठकर तैयार हो जाना तुम्है मेरे साथ चलना है।एक पैकेट छोटू की तरफ फैंकते हुऐ संगीता देवी ने कहा। संगीता देवी एक समाज सेविका थी और कल उन्हें बाल...

  • काश मैं भी परिंदा होता

    काश मैं भी परिंदा होता

    आज के इंसान की ज़िंदगी- जैसे सलाखों के पीछे कैद , लगती हैं कारावास सी, कुछ सलाखें हैं व्यावसायिक मज़बूरी की, कुछ सलाखें हैं पारिवारिक दायित्व की, कुछ धर्म की, कुछ समाज की, कुछ सरकारी नियमों...

  • शरद ऋतु

    शरद ऋतु

    शरद ऋतु  बर्फ की सिल्लियों सा नभ में हैं बादलों का प्रसार शशि किरणें कर रही हैं धरा पर शीत की बौछार् झील में मिश्री की डली सा घुल गया हैं पूनम का चाँद मचल उठी...


  • कविता : चिट्ठी

    कविता : चिट्ठी

    दूर देश से आई चिट्ठी उसमें थी वतन के मिट्टी की सोंधी खुशबू ख़त में थे माँ की स्नेहिल झिड़की क्यों नहीं आती तुम्हारी चिट्ठी थोड़ी खट्टी थोड़ी मिट्ठी काश तुम भी लिखती चिट्ठी और थी...

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