नवीनतम लेख/रचना


  • माँ

    माँ

    वो जो टूटे छत के नीचे, कचरोँ के ढेर से जलते चूल्हे मेँ एक पुराना पीतल का पतीला रखकर उबलते पानी को, बनता भोजन बताती है। काम के बहाने फटे वसनोँ मे ही लकडियां बीनने जंगल...

  • एक युवा का सुघोष…

    एक युवा का सुघोष…

    राह नहीँ छोडूँगा चाह नहीँ छोडूँगा आ जाएँ पथ पर शूल सभी, प्रयत्न हो जाएँ धूल सभी, मै नित नवक्राँति अलख की बाँह नही छोडूँगा, राह नही छोडूँगा। मैँ दृढता से बढता जाता आगे, टूटे बंधन...

  • मोह

    मोह

    फिर बादलोँ ने कुछ रुप बदला, कुछ ऐँसे बिखरे कि अंबर पर आकृतियां उभर आयीँ, ये श्वेत श्यामल मेघ फिर किसी आकृति को उकेरते अंबर पर निशा का स्वागत करने खडे हो गये, इस बीच शशि...

  • आधा-अधूरा हक – कहानी

    आधा-अधूरा हक – कहानी

    गिरिधर बाबू के यहाँ पँचायत बैठी थी। उनके और उनके भाइयों के बीच पैतृक संपत्ति के बँटवारे का फैसला होना था। दोनों छोटे भाई नृपेंद्र और जगतेश्वर आये हुए थे। सौतेला होने के बावजूद गिरिधर बाबू...


  • सिस्टम   …….!

    सिस्टम …….!

    आये दिन लटकती लाशे फूल बनने से पहले दम तोड़ती कलियाँ बलात्कार, चोरी , डकैती हत्या , आतंकवाद रोजमर्रा की ज़िंदगी में इस कदर घुल चुकी है और सिस्टम चुप है खामोश है ! ……। हा...


  • ***मैँ मध्यप्रदेश हूँ ***

    मैँ भारत माता का हृदय हूँ, सत्य सार्थक की विजय हूँ, ग्वालियर का राजभवन मै, उज्जैनी का महाकाल हूँ, राजाओँ की नगरी इंदौरी ठाट बाट का भोपाल हूँ। खजुराहो का शिल्प महान फिर, बाँधवगढ का शेर...

  • और पेड़ बहुत रोया….

    मेरी इन दो भुजाओँ मेँ, मेरी पत्तियोँ की छाओँ मेँ, दो मासूम कलियोँ को दरिँदोँ ने मसल डाला, मैँ देखता रह गया, मेरी भुजाएँ मेरी टहनियां, जिसपर टंगी दो बेटियां, मानवता के निर्मम हत्यारोँ का शिकार...

राजनीति

कविता