नवीनतम लेख/रचना

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    हवा निगोड़ी छेड़ती

    हवा निगोड़ी छेड़ती , नरंम लता शरमाय । मन-ही-मन मुसकाय कें तरु से लिपटी जाय ।। *********************************************** नर्म पाव से आ गयी ,स्वर्ण किरण ले भोर । कलियाँ ले अंगडाइयाँ, भंवरा करता शोर ।। ********************************************* कलुष...

  • “चलने के खातीर”

    “चलने के खातीर”

    उठता हूँ गिरता हूँ चलने के खातीर पढता हूँ लिखता हूँ चलने के खातीर निगाहें लगी सिर्फ मंजिल डगर पर कहता हूँ सुनता हूँ चलने के खातीर || बताओं न दुनियां में राहें हैं कितनी चलूँ...






  • मेरी कहानी ३९

    मेरे जैसे इंसान के लिए स्वजीवनी लिखना इतना आसान नहीं है क्योंकि अपनी कहानी लिखने के लिए सचाई लिखनी पड़ती है और यह सचाई लिखने में बहुत कठनाईआं पेश आती हैं। मैंने कुछ स्वजीवनीआं पडी हैं...


  • नई दिल्ली

    नई दिल्ली

    नयी दिल्ली सुखों का दरिया गहरा, दुःख का सैलाब दिल्ली पुरानी है, इतिहास के पन्नों को पलटा, बार-बार उजड़ती देखी दिल्ली पुरानी है। नयी दिल्ली अंग्रेजों का आशियाँ, भारतीयों की पहचान दिल्ली पुरानी है, फाँसी का...

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