नवीनतम लेख/रचना

  • दो मुक्तक

    दो मुक्तक

    1 दूसरों की कही सारी नकारात्मक बातें सुना नहीं करते कुछ की आदत अपनी हार का बदला, आलोचना हुआ करते ऊपर वाले ने ऐसे समय के लिए ही तो दो कान दिये हैं जिसके रास्ते दिल-दिमाग तक...

  • पिता

    पिता

    पिता नाम भरोसे का जिसमे महफूज़ रहता हर बचपन जब जब डरी मैं देखकर दुनिया का घिनौना रूप पिता ने दिया भरोसा मैं हूँ कहकर रखा सर पर हाथ भागा भूत डर का लगकर उनके सीने...

  • भ्रम

    भ्रम

    बहुत दिनों तक महीनों तक जब मै नही लिख रहा था कविता……! समुद्र से कुछ दूर रेत पर मछली की तरह जी रहा था तड़फ रहा था मेरे सपनो को लोग अपने जूतों से कुचल रहे...

  • मेरी मर्जी

    मेरी मर्जी

    स्त्री हूँ हाँ स्त्री ही हूँ कोई अजूबा नहीं हूँ, समझे न ! क्या हुआ, मेरी मर्जी जब चाहूँ गिराऊं बिजलियाँ या फिर हो जाऊं मौन मेरी जिंदगी मेरी अपनी, स्वयं की जैसे मेरा खुद का...


  • आशीर्वाद

    आशीर्वाद

    आज मैं अपने स्वप्न महल के के बालकनी में बैठकर आसमाँ में ढूंढ रही हूँ अपने अपनों को कि उनसे मिलकर उन्हें प्रणाम करूँ… बहुत बहुत धन्यवाद कहूं…रात तारों के मध्य में शायद मिल जाएं मेरे...

  • कविता : वादा

    कविता : वादा

    मुझसे वादा करो मुझे रुलावोगे नहीँ हालात जो भी हो मुझे भुलाओगे नहीं छुपा के अपनी आँखों में रखोगे मुझ को दुनिया में किसी और को दिखाओगे नहीं मेरे लफ़्ज मेरे दिल की तहरीरें हैं, कसम...

  • कुर्सी की महिमा

    कुर्सी की महिमा

    मैं हूँ कुर्सी महारानी सुनो मेरी कहानी हर तरफ हर क्षेत्र में चलती मेरी मनमानी मेरे कारण कितनों ने खेली खूनों की होली अपनों से भी तोड़वा दूँ रिस्ते वो चीज हूँ मैं अलबेली माँ की...



कविता