नवीनतम लेख/रचना

  • चतुष्पदी

    चतुष्पदी

    माँ का दूध कलंकित कर , नारी पर शक्ति दिखाते हैं ऐसे नापाक नामर्द जगत में, कैसे मुख दिखलाते हैं पुरुषत्व कभी न शोषण करता, प्रेम का पाठ पढ़ाता है क्यारी-क्यारी सींच सींच कर, गुलशन रोज सजाता...

  • वाह रे मेरे हरिश्चंद्र

    वाह रे मेरे हरिश्चंद्र

    लाइब्रेरी के सामने से मैं अपने कुछ मित्रों के साथ कुलपति महोदय से कुछ काम के सिलसिले से मिलने जा रहा था, तभी पीछे से किसी ने आवाज लगायी- ‘रुकिये महोदय !’ हम लोग रुके, मुड़कर देखा...


  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    हर क़दम एक डर सा लगता है आदमी क्यूं शरर सा लगता है डर अंधेरों से क्यूं रहे मुझको उसका चेहरा सहर सा लगता है इसलिए रखते हैं ख़बर उसकी वो हमें बेख़बर सा लगता है...


  • नवगीत : पहली दफा

    नवगीत : पहली दफा

    पहली दफा जब तुम मिले तो सब मिल गया पहली दफा जब तुम हुए खफा तो सब मिट गया पहली दफा जब तुम हंसे तो ये जहाँ खिल गया पहली दफा जब तुम रोए तो आँखों...

  • दोहा-मुक्तक

    दोहा-मुक्तक

    दोहा-मुक्तक मूरख जनता है नहीं, अब वो है चालाक, नेता जी की नियत को, वो लेती है झाँक।। जाकर के मतदान में, अपना देती वोट। बढ़ते भ्रष्टाचार पर, कर देती है चोट।। — अमन चाँदपुरी

  • नज्म

    नज्म

    रंज यह नहीं कि कोई गुफ्तगु नहीं अब दरमयां | मलाल यह भी नहीं कि गैरों से हैं अब सिलसिले | इक छोटा सा सवाल है रह- रहकर जो जहन मे आया | क्या दस्तूर है...

  • ग़ज़ल : ज़माने की हकीकत

    ग़ज़ल : ज़माने की हकीकत

      दुनिया में जिधर देखो हजारों रास्ते दिखते मंजिल जिनसे मिल जाए वे रास्ते नहीं मिलते किस को गैर कह दें हम और किसको मान लें अपना मिलते हाथ सबसे हैं दिल से दिल नहीं मिलते...


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