नवीनतम लेख/रचना



  • सफेद बाल…

    सफेद बाल…

    आज जब खुद को देखा आईने में तो सकपका सी गई आंखे चौंधिया गई दिल का धङकना जैसे थम सा गया एकटक..पल पल बस खुद को ही निहार रही थी खुद पर विश्वास भी कहाँ हो...

  • शौक

    शौक

    कृष्ण बचपन में पढने के साथ-साथ मूर्तिकला में भी निपुण था | उसके मम्मी-पापा उसके इस शौक को पढाई में बाधा मानते थे | लेकिन जब स्कूल में मूर्तिकला की प्रतियोगिता जो कि जिला स्तर की...

  • पितृपक्ष

    पितृपक्ष

    हुआ खत्म पितृपक्ष अब नवरात्री आई है कर पित्रों की पूजा माता की बारी आई है पितृपक्ष में खिला ब्राह्मणों को सोचते कमाया पुण्य है नवरात्री में सजाकर मंदिर खिलाकर लंगर लोगों को दिखाया अपना धर्म...

  • हमारे थोथे आदर्श

    हमारे थोथे आदर्श

    अधिकतर लोगो की शिकायत रहती है की मैं धर्म या भगवान् को लेके नकारात्मक विचार रखता हूँ, जिन्हें अधिकतर लोग भगवान् मान के उनके आदर्शो गुण गाते हैं उनके बनाये आदर्शो पर चलने की प्रेरणा लेते...



  • कविता : मर्यादा

    कविता : मर्यादा

    ‘तुमसे प्यार करता हूँ “रोज रोज यह कहने से क्या फ़ायदा मेरे मौन को समझती हो तुम मेरे शब्दो से ज़्यादा पर मन कहता हैं  प्रेम ग्रन्थ के अंतर्गत शायद हो यह नियम भी बाक़ायदा सूर्य मुखी सी मेरी ओर घुम...

  • यादें

    यादें

    मेरे लिए तो हर दिन त्यौहार होता था ,जब तक मेरी माँ जीवित रहीं ….. छोटा – बडा कोई पर्व हो तो मेरे लिए नये कपडे बनते थे ….. और वो कपड़े मेरी माँ ही सिलती...

कविता