नवीनतम लेख/रचना


  • कविता

    कविता

    समाज से बड़कर बस अपना थोड़ा सा स्वार्थ हो गया | चन्द पैसों और ज़मीन के लिए अपनों मे कितना विवाद हो गया | एक दूजे को देते दोष हर बात दूसरे पे इल्ज़ाम हो गया...


  • हाँ तुम!!

    हाँ तुम!!

    हाँ तुम!! मुझसे प्रेम करो। जैसे मैं तुमसे करता हूँ। जैसे मछलियाँ पानी से करती हैं, उसके बिना एक पल नहीं रह सकती। जैसे हृदय हवाओं से करती है हवा बिना हृदय गति रूक जाती है...

  • स्मृति के पंख – 30

    मेरा मन बहुत परेशान था। लेकिन पृथ्वीराज का हौसला बहुत था। उसने कहा- भापाजी क्यों खफा होते हो, मैं शादी नहीं कर सकता तो क्या हुआ, सुभाष के बच्चों को प्यार दूँगा। मैं सोचता- बेटा अभी...

  • लघुकथा : ठहाका

    लघुकथा : ठहाका

    “साहब, भारत में माता के नौ रूपों की पूजा होती है,” मंदिर के सामने माता की मूर्ति को नमन करते हुए राजू गाइड ने अमेरिकन टूरिस्ट से अंग्रेजी में कहा और नवरात्रों का महत्व तथा माता के...

  • करारी कुण्डलियाँ

    करारी कुण्डलियाँ

    हास्य व्यंग का हर कवि पहलवान श्रीमान । शब्दों का मुगदर बना द्वंद्व करे बलवान । द्वंद्व करे बलवान कि कस के काव्य लंगोटी । कर देता अच्छे अच्छों की बोटी बोटी । कह पुनीत कवि...


  • तुम….

    तुम….

    कहाँ रह रही हो तुम मुझे अकेला छोड़कर दुनिया की महफिल में मुझे तन्हा छोड़कर मुसाफिरों की तरह यहाँ चक्कर काटता हूँ मना लेता मन को,आने की आहट सुनकर रह जाता है मेरा दिल देखने को...


राजनीति

कविता