नवीनतम लेख/रचना

  • आओ उठेँ हम फिर से

    आओ उठेँ हम फिर से

    रोज दिन उठता है रोज दिन ढलता है काफिला परिँदोँ का ऐंसे ही चलता है पेड चुपचाप खडे रहते, थपेडे हवा हैँ सहते, रोज बादल हो इकट्ठे ऐँसे ही हैँ बहते। अंधेरा रोज शाम आता, निशा...

  • दौर हैं बदल रहे…

    दौर हैं बदल रहे…

    आज अचानक से जहन में एक महान साहित्यकार, कवि, ग़ज़लकार ‘दुष्यंत कुमार’ की एक पंक्ति आ गयी. उस ग़ज़ल की उस पंक्ति को अपनी जुबान से अगर मैं बोल भी लेता हूँ तो मेरे रोंगटें खड़े...

  • अनसुलझे सवाल!!!

    अनसुलझे सवाल!!!

    कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी……. पैरों से चढ़ती ठण्ड हाथों के कम्पन से होती हुई, दांतों की कड़कड़ाहट तक जा रही थी। घर से निकला तो देखा कोहरे की सफ़ेद चादर ने सारे आसमान पर...

  • मेरा पहला प्यार

    मेरा पहला प्यार

    पहला प्यार ! कितना मधुर एहसास दे जाते हैं ये दो ख़ूबसूरत लफ़्ज़ ! इन्हें सुनते ही ज़हन  इनके पीछे दौड़ने लगता है। और ये.…… तितलियों की तरह उड़ते -उड़ते उस बाग़ में ले जाते हैं ,...




  • कविता : सुई-धागा

    कविता : सुई-धागा

    तुमने जोसुई-धागा दिया था सितारे टाकने को…उससे मैने अपनी उदासी की उधड़ी चादर टांक लीकोई क्योंकर जान पाएउदासियों के पीछे कौन रहता है…(यकीन मानो मैने अबतक किसी को जानने नहीं दिया की….सितारे कहाँ है…टाकने कहाँ थे और सुई-धागा...

  • कविता : असहमति के सोलह साल

    कविता : असहमति के सोलह साल

    विवाह के सोलह साल बादसोचती है श्यामलीकभी सहमती नहीं ली गई उसकीदेह उसकी थी देहपति दूसरा…सहमति नहीं ली गई उसकीजब पहली बार किन्ही निगाहों नेबाहर से भीतर तक नाप डाला उसेउसकी देह के बारे में जितना जानते...

  • कविता : कविता चाँद पर

    कविता : कविता चाँद पर

    हवाओं से रगड़ खा खा करछिल गए कन्धेहथेलियों पर बादल टिका कभी नहीं टिकाआँखे धूल सने आसमान परजहाँ ना कोई नक्षत्र ना आकाशगंगा…अमावस की रात मेंअपना ही हाथ सूझे ना सूझे…पर कविता अगर चाँद पर लिखनी...

राजनीति

कविता