नवीनतम लेख/रचना

  • चलो उठो….

    चलो उठो….

    कदमो के निशान उभरते हैं रास्तो पर रास्ते उभरते हैं मंजिल की सुरत बीते साल बीते दिन मौसम बीते बीत गया हर पहर उम्र का उम्र बीती साथ-साथ हर पहर एक दिन ख़ास का ख़ास दिन...


  • वह भिखारी

    वह भिखारी

    ” बाबू जी … बाबू जी .. दस पांच रूपये दे दीजिये , बहुत भूंख लगी है बच्चे को मेरे दूध लाना है ” जैसे ही चन्दन ने अपनी गाडी एक शानदार बिल्डिंग के सामने रोक...



  • अधूरे ख़्वाब

    अधूरे ख़्वाब

    नेहा के पास जीने का कोई मकसद नहीं रहा, बस जी रही थी, क्युकि मरना उसके लिए इतना आसान नहीं था | एक के बाद एक समस्याओ से उसका जीवन घिरा रहता था| पता नहीं वो...



  • एक झीना सा आवरण

    एक झीना सा आवरण

      बिना किये तुम्हारा  दर्शन सूनी लगती हैं धरती सूना लगता हैं अंबर माना की तुम मेरे लिये सिर्फ एक ख्याल हो वैसे भी जीवन भी तो हैं एक सपन कितना भी चाहों दूरी बनी ही रहती हैं...

  • यशोदानंदन-११

    कंस तो कंस था। वह पाषाण की तरह देवी देवकी की याचना सुनता रहा, पर तनिक भी प्रभावित नहीं हुआ। देवी देवकी ने कन्या को अपनी गोद में छिपाकर आंचल से ढंक दिया था, परन्तु कंस...

कविता