नवीनतम लेख/रचना




  • मेरी माँ ने

    मेरी माँ ने

    मेरी माँ ने झूठ बोल के आंसू छिपा लिया भूखी रह के भी, भरे पेट का बहाना बना लिया. सर पे उठा के बोझा जब थक गई थी वो इक घूंट पानी पीके अपना ग़म दबा...


  • अपनी ही अंजुमन में…

    अपनी ही अंजुमन में…

    अपनी ही अंजुमन में मैं अंजाना सा लगूं बिता हुआ इस दुनिया में फ़साना सा लगूं.   गाया है मुझको सबने, सबने भुला दिया ऐसा ही इक गुजरा हुआ तराना सा लगूं.   अपने ही हमनशीनों...


  • ****पिता****

    ****पिता****

    ****पिता**** माँ का हर श्रृंगार पिता। बच्चों का संसार पिता।। माँ आँगन की तुलसी है। दर के वंदनवार पिता।। घर की नीव सरीखी माँ। घर की छत-दीवार पिता।। माँ कर्त्तव्य बताती है। देते है अधिकार पिता।।...

  • कुछ सपनें टूट गए तो क्या

    कुछ सपनें टूट गए तो क्या

    कुछ सपनें टूट गए तो क्याकुछ अपने रूठ गए तो क्याजीवन के ……दुर्गम पथ परकुछ साथी छूट गए तो क्यासूरज तो फिर भी निकलेगानयी सुबह फिर भी आएगी फिर भोर करेगें पक्षी करलवफिर पवन सुगंध फैलाएगीयह अंधकार...

  • तुम…. बस पागल कर देती हो

    तुम…. बस पागल कर देती हो

    नैन कमान के चितवन से …..बस घायल कर देती हो कैसे तुमको समझाऊँ तुम…. बस पागल कर देती होजन्मों से प्यासा था मैं, हलक में लार थी बची नहींप्यासे प्यासे कंठ में तुम, प्रिय गंगाजल भर देती...

कविता