नवीनतम लेख/रचना


  • मेरी कहानी – 41

    हमारे इम्तिहान हो गए थे और हम गाँव में घूमते  रहते। जैसे अक्सर होता है, उम्र के बढ़ने के साथ ही  हमारा हर चीज़ को देखने का नजरिया ही बदल जाता है, हम गाँव के इर्द गिर्द घूमते और...


  • मुक्तक

    मुक्तक

    ————–मुक्तक- (१)————— अपने आपके लिए…. बहुत से लोग जीते हैं। कभी एक दूजे के लिए भी.. लोग जी लेते हैं। ऐसा करें, लोग दिल में अच्छा जगह देते रहे, अपने से ज्यादा दिलदार दूसरे लोग ही...

  • कविता

    कविता

    शहर के उपर नीले साफ़ आकाश का शामियाना मन में बिना पंख उड़ने की चाह हवा में उड़ती सौधी गंध खिड़की से देखती सडक पर बच्चो का दल आँखे जुगनुओं सी झिलमिलाती माथे पर हल्दी का...



  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    आओ कभी गिला करें तो ऐसे कि अपनापन सा लगे | तुमसे मिलकर भी तुम्हारी कमी खलती है क्यों , चलो कभी ऐसे भी मिले कि दिल को अच्छा भी लगे | क्या बात है कि...

  • भैंस कहीं की

    भैंस कहीं की

    हरी घास चरने गयी थी गर्मियों में कहीं गंदे गड्ढे में गिर कर आयी है नहीं सुधरेगी नासमझ भैंस कहीं की किन खेतों की हरियाली हर आयी है || गिलौरी घास का, खा पगुरी करती है...