नवीनतम लेख/रचना

  • नास्तिकता से आस्तिकता तक

    नास्तिकता से आस्तिकता तक

    स्वामी श्रद्धानन्द का प्रकाशमय जीवन एक काल में घोर अन्धकार में था। आप लिखते हैं जब मैं छोटा था मेरे पिताजी पक्के ईश्वरविश्वासी थे।  प्रतिदिन धार्मिक ग्रंथों का स्वाध्याय किया करते थे। मुझे जब वे ऐसा...



  • मासूमियत का संहार

    मासूमियत का संहार

    मासूमियत का संहार हमला चाहें पाकिस्तान के पेशावर में हो चाहें फिर मुंबई में हो चाहें निर्दोष नागरिकों का क़त्ल हो या फिर मासूम स्कूली बच्चों का निर्मम नरसंहार हो मरती तो इंसानियत ही है होता...

  • वो जब भी ….

    वो जब भी ….

      वो जब भी मुझसे मिलता है दीवाने की तरह उसमें फ़ना होने की चाह है परवाने की तरह उसे नजर अंदाज करूँ भी तो किस तरह करूँ मैं नज़र बंद हूँ उसकी आँखें हैं आईने...

  • फूलों की बात

    फूलों की बात

    फूल तुम्हारा हर बार खिलना पहली बार खिलने जैसा कौतुक,अचरज और विस्मय से भरा फूल तुम्हारा हर बार मुरझाना जैसे अंतिम बार विदा होना …… इस खिलने और मुरझाने के मध्य असंख्य वेदना और आनंद के...



  • अभिशप्त बचपन

    अभिशप्त बचपन

    है कैदियों जैसा बचपन उस नन्ही मासूम का दिवारों के अलावा कोई भी तो नही जो जो सुने उसकी सिसकियॉ ना दोस्त,न रिश्तेदार किस्से करे बातें किसके संग करे हंसी ठिठोली मां की उंगली पकड़ पुछ्ती...


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