नवीनतम लेख/रचना

  • तमाशा मज़ेदार न था

    तमाशा मज़ेदार न था

    वो खरीद लेता था सबके आँसू बेधड़क वो इस ज़माने के लिए अभी समझदार न था कुछ तो कमी थी जो तू किसी की न हो सकी तेरा हुश्न कातिल तो था पर ईमानदार न था...

  • अंगार सुनाता हूँ!!

    अंगार सुनाता हूँ!!

    मैंने भी श्यामल ज़ुल्फों में, अपनी शाम गुजारी है मैंने भी रस भरे लबों पर, अपनी ग़ज़लें वारी हैं मैं भी तो गोदी में रखकर, सिर को अपने सोया हूँ झीलों-से गहरे नैनों में, मीठी नींदें...

  • कविता

    कविता

    जिंदगी की वीरानियों को समेटने की नाकाम कोशिशें , ले आती हैं इंसान को जब कभी दोराहे पर बिखर जाता है एक अंधेरा से चारों तरफ । सुलगने लगता है शांत पड़ा अहसास भी दहकती हुई...

  • बलात्कार

    बलात्कार

    क्या से क्या आज की कहानी हो गयी , हर तरफ चर्चा रेप का दुनिया दीवानी हो गयी । भाषणबाजी ये आज आम हो गयी , आज औरत खुलेआम बदनाम हो गयी । सतयुग में द्रौपदी...

  • “ग़ज़ल”

    “ग़ज़ल”

    मात्रा भार-17, काफ़िया- आर, रदीफ़ – दे मुझको “गज़ल” थोड़ा थोड़ा प्यार दे मुझको कर्ज ही सही उधार दे मुझको खोए वक्त के इंतजार में एक नई सवार दे मुझको।। बैठी नाव देखती तुझको दरिया पार...

  • हाय री मोह्हबत

    हाय री मोह्हबत

    तुम को चाहता हूँ अपनों की तरह तुम मुझे देखती हो गैरों की तरह मेरी मोह्हबत में वो कशिश नहीं या तुम्हारी नज़र मुझ पे पड़ती ही नहीं तुम समझ कर ना समझ हो या समाज...

  • ममता की परीक्षा ( भाग – 8 )

    ममता की परीक्षा ( भाग – 8 )

      सुधीर की इस अप्रत्याशित हरकत से अनजान रजनी हड़बड़ाकर पीछे सरक गई थी और फिर स्थिति का भान होते ही अपने कदमों में झुके हुए सुधीर को दोनों कंधों से पकड़कर उसे सांत्वना देने का...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    हंसाती है रुलाती है हमेशा आजमाती है जिंदगी है बड़ी संगदिल मगर जीना सिखाती है जब दर्द की हद हो जुवां खामोश हो जाए दबा कर आह सीने में अश्क पीना सिखाती है। हजारों बार टूटा...

  • मेला –रेला

    मेला –रेला

    यह वक़्त कितना बेरहम पल में क्या से क्या हो जाता है, एक हँसता गाता चेहरा आंसूओं से तर बतर  चीख पुकार में बदल जाता है, कुछ देर पहले…बंटी बोला था… …पापा मैं दशहरा मेला देखने...

  • ‘मीटू’ ‘मीटू’

    ‘मीटू’ ‘मीटू’

    ना मेरी खता थी न तेरी खता थी, कुछ मेरी तमन्ना थी कुछ तेरी ज़रुरत थी, ना तुमने कुछ कहा ना मैंने कुछ कहा बस आँखों आँखों की गुगतगूं थी , ना तुम मुस्कुराये ना हम...

कविता