नवीनतम लेख/रचना

  • गीतिका – पर्यावरण

    गीतिका – पर्यावरण

    आओ मिलकर शपथ लें पर्यावरण बचाएं हम। चहुंओर हरियाली हो प्रकति को सुंदर बनाएं हम। ताजी, ठंडी, खुली हवा मिले मन में हो खुशहाली, भारत भूमि के कण-कण में हरियाली फैलाएं हम। मनभावन पृथ्वी ये प्यारी...

  • गीत

    गीत

    भले नहीं ईश्वर को मानें पर्व न उसके मानें महापर्व जो लोकतंत्र का इसकी महता जानें। नीति बनाने वाले हों वे जो खुद इस पर चलते ऐसे लोगों को चुनने के स्वप्न रहें बस पलते भेद-भाव...



  • हिंद का गांव

    हिंद का गांव

    शरीर बसा दूर देश में किंतु मन में बसा हिंद के गांव है, जहां की बोली में सरलता और जीवन में सहजता का भाव है। माटी की पगडंडी पर जब बारिश की पहली बूंदें गिरती है...


  • गज़ल

    गज़ल

    छोड़कर अपना मैं और तुम आओ हम बनाते हैं मिला कर सारे सुर कोई नई सरगम बनाते हैं ============================ उनकी नफरतों का प्यार से देकर जवाब उनको देखो दुश्मनों को कैसे हम हमदम बनाते हैं ============================...

  • बसन्ती दोहे

    बसन्ती दोहे

    नीलगगन उज्जवल, लगे शीतला लगे बयार। हंस वाहिनी का जनम, वहे बसंती धार। १ उपवन में कलियां, खिली भ्रमर मचाए शोर। फूल फूल इठला रहे, देश बसंती भोर। २ मन भावनी सुहावनी, है ऋतुराज बसंत। उपवन...

  • कहानी – कलाकार

    कहानी – कलाकार

    वह अब हर रोज बगै़र कोई नागा किए आ रहा है। खुले मैदान में जहां से लोग उसके सामने से गुजरते,वहां पर वह अपना छोटा सा स्टूल रखता, एक स्टूल ठीक अपने सामने कोई 4-5 फुट...

  • गजल

    गजल

    चैन से जी रही थी क्यूं सताने आ गये। दिल में घर अपना क्यूं बनाने आ गये।। मिलता नही करार मुझे पल भर के लिये। बेचैनी फिर मेरी तुम क्यूं बढ़ाने आ गये।। वादा किया जो...

कविता