नवीनतम लेख/रचना

  • शंखनाद

    शंखनाद

    नारी तुम, बन चंडी, उतर धरा पर.. करो स्वतन्त्रता का आगाज़ …! काटो बन्धन, लिए हौंसलें… भरो उड़ाने…. न रोक सके कोई परवाज़…!! कब तक ट्विंकल, कब तक आसिफा, कब तक बेटियाँ मारी जायेंगी ..! आने...


  • आक्रोश

    आक्रोश

    मुझे आक्रोश है आज भी उन लोगों से जिन्होंने मेरा साथ तब छोड़ा जब मुझे सबसे ज्यादा जरूरत थी। मुझे आक्रोश है आज भी उन लोगो से  जिन्होंने मेरी मोहब्बत को तब ठुकरया जब मुझे किसी...


  • जलता है आंगन

    जलता है आंगन

    ग़ज़ल जलता है आंगन, तपती है देहरी। सुबह से शुरू होने लगती दोपहरी।। आसानी से अब ये पटती कहाँ हैं। दरारें दिलों की हुई इतनी गहरी।। कानों में गूंजे सिक्कों की खन खन। दलीलें कहाँ से...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    रोज़ उसको न बार बार करो। जो करो काम आर पार करो। आ  के  बैठो गरीब  खाने  में, मेरी दुनिया को मुश्कबार करो। तेरे बिन है खिजाँ खिजाँ मौसम, आ के मौसम को खुशगवार करो। जब...

  • कविता

    कविता

    प्यार प्रकृति से जो कर ले प्यार को सही पहचानेगा नील गगन से तारे तोड़कर क्या खोएगा क्या पायेगा प्यार अविरल धारा में हैं प्यार प्रकृति प्रवाह में है प्यार सीखें परिंदों से हम प्यार सीखे...


  • दोहे : सौंदर्य-स्तुति

    दोहे : सौंदर्य-स्तुति

    र्पण ने नग़मे रचे, महक उठा है रूप! वन-उपवन को मिल रही, सचमुच मोहक धूप!! इठलाता यौवन फिरे, काया है भरपूर! लगता नदिया में ‘शरद’, आया जैसे पूर!! उजियारा दिखने लगा, चकाचौंध है आंख! मन-पंछी उड़ने...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    सपने  सब बे  नूर  हुये हैं। दिलबर जबसे दूर  हुये हैं। घर  में  ही महसूर  हुये हैं। जब से  वो  पुरनूर  हुये हैं। डरने  पर  मज़बूर  हुये हैं। चन्द क़दम ही दूर  हुये हैं। खूब बड़ों...

कविता