नवीनतम लेख/रचना






  • दोहे

    दोहे

    श्रृद्धा की थाली सजी, मनभावों के दीप। स्वीकारो प्रभु वंदना, अंतस करो सुदीप।। रीति नीति सत साधना, मानव सेवा भाव। जीवन में सब से रहे, सदा उचित बर्ताव।। धन दौलत वैभव भले, मत देना जगदीश। इतनी...


  • कांच के टुकड़े

    कांच के टुकड़े

    टूटे हुए टुकड़ों को काश संभाला होता आशियाँ को अपने यूँ न जलाया होता गैरों को अपना बनाने की हसरत में यूँ न अपनों पर बेरुखी का कहर ढाया होता ईमान पर चलने वाले भी दागदार...

  • बगाबत

    बगाबत

    बगाबत पे उतर आती है जिंदगी , कानून को परे रखकर खंजर की तरह । लहूलुहान हो जाते हैं रिश्ते भी आजकल, गैरों को अपना बनाने की जुस्तजू की तरह । आंखों में उतर आती है...

  • गीतिका

    गीतिका

    इतना न हमे याद आया करो हर जगह न यूं सताया करो रोज होती है लड़ाई हमसे प्यार फिर न जताया करो घड़ी दो घड़ी जहन से मेरे दूर कही चले जाया करो मचल उठती है...

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