नवीनतम लेख/रचना






  • क्षणिकाएँ

    बेटियाँ होती है गर देवी स्वरूप फिर क्यों निगल जाता दहेज़ कुरूप “““““` छुईमुई सी धूप उतरी धरा पर इन्द्रधनुषी तूलिका संग भर नव जीवन अलसाई सी कलियाँ हँसी खिलखिलाई । ““““““““ है नादान मोहब्बत तेरी...


  • शिशुगीत – 2

    शिशुगीत – 2

    १. गेंद रंग-बिरंगी आती है मेरा मन बहलाती है बल्ले, हॉकी, रैकेट से ढेरों खेल खिलाती है   २. पंखा फर-फर, फर-फर चलता है गरमी दूर भगाता है निंदियारानी को लाकर सारी रात सुलाता है  ...


  • मुक्तक

    मुक्तक

    वेद की ये बात है हम सदा सहजोर थे, राज सुन लो आज तुम हम सदा पुरजोर थे, काल की धारा बही और टूटा तार सब, आक्रमण भी झेल कर हम नही कमजोर थे। दिनेश”कुशभुवनपुरी”

कविता