नवीनतम लेख/रचना




  • मन : हार जीत

    मन : हार जीत

    मन हारा तो मैँ हारा मन जीता तो मैँ जीता पल पल क्षण क्षण जीवन संग्राम, मन के बाहुबल मेँ बीता। खंड खंड हो गयी चेतना, तार तार जब मेरी वेदना, कौन अपना कौन पराया, खुला...

  • नेपथ्य

    नेपथ्य

    मन के स्पंदन करते तार, क्रंदन करती झनकार, कुछ डूबते से उठते से मन को, फिर घेर रहा अंधकार, घनेरा तमस फैला, भटकता मन अकेला, पथ के आवर्तोँ से हारा, कब होगा नवउजियारा। तब किलकारी लेती...


  • मेरा हिँदुत्व

    मेरा हिँदुत्व

    मेरा हिँदुत्व केवल धर्म नहीँ है, पंथ नहीँ है, वर्ग नहीँ है, ये मन की विचारधारा है, मुझको प्राणोँ से प्यारा है, ये जीवन जीने की कला महान, ये सत्यपथ का महाविज्ञान, ये कोई जात नही...

  • संध्या

    संध्या

    सूरज पश्चिम के तट खडा है, आज बादलोँ का जमघट बडा है, संध्या की बेला लेती अंगडाई है, भगवा चदरिया अंबर पर छाई है। पवन मद्धम बहती है पंछी चहकते हैँ, बाग बाग सुरभित कर गुलाब...

  • नव उद्भव

    नव उद्भव

    तंगदिलोँ मेँ फिर मैँ कोई आग लगाने आया हूँ, वो जो हारा बैठा राही है उसे जगाने आया हूँ। जिसके पथ पर विपदा है, जिसकी राह पर शूल अनेक, उसकी मंजिल पर बिखरे है, नवोत्सव के...


कविता