नवीनतम लेख/रचना


  • चाहता है !

    चाहता है !

    देखना चाहता है समाज आज भी नारी को बस खूंटे पर बंधी गाय ! पालतू पशु, पिंजरे में कैद, पंछी के पर कटे घर में पड़े बेजान सामान सा! चाहता है पुरुष साड़ी में लिपटी मुंह...

  • मैं

    मैं

    मैं समाज और संसार के बीच  की वो धुरी हूँ जो प्रकृति  का सन्तुलन बनाये रखने मैं समर्थ है मैं सिफ ज़रूरत नहीं मैं जननी हूँ मैं उत्पत्ति हूँ तुम्हारे चाहने- नहीं चाहने से कूछ नहीं...


  • स्त्री

    स्त्री

    रसोई से उठते, घी के धुँये सी सुबह, दीपक की लौ सी जलती शामें! भाव का दीप प्रज्जवलित कर, खुद को ही खडा कर लेती हूँ, भगवान के आगे! दिन की वीरानी जब , साँय -साँय...

  • यशोदानंदन-१७

    कैसी विडंबना थी – गोकुल में जहां आनन्दोत्सवों की शृंखला थमने का नाम नहीं ले रही थीं, वही मथुरा में कंस के भवन में षडयंत्रों की शृंखला भी रुकने का नाम नहीं ले रही थीं। पूतना-वध...

  • उपन्यास : देवल देवी (कड़ी 42)

    38. स्वधर्म स्थापना हेतु शील बलिदान आहट सुनकर देवलदेवी शय्या से उठकर खड़ी हो गई। कक्ष में शहजादा खिज्र खाँ आ चुका था मदिरा के अत्यधिक सेवन के प्रभाव से लड़खड़ाते कदम, अफीम के असर से लाल होती...

  • दीवानी

    दीवानी

    एक बात कहूं हाँ ….कहो अगर मैं तुमसे बात न करूँ सब खाली खाली सा लगता है … पगली………. लो आज फिर दिल भर के बातें कर लो मेरे साथ भर लो सब खाली खाली को…….....

  • रात

    रात

    सुनो मै रात हूँ! होता हैं मेरा बसर नीरवता में… करती हूँ रहगुजर नीरवता से… सन्नाटा सुनती हूँ, जीती हूँ… पल,पल, पहर,पहर गुज़रती जाती हूँ! हैं मेरे मुक़द्दर में सहर … क्योंकि हैं मेरे गर्भ में...

  • मैं चलती हूँ

    मैं चलती हूँ

    मुर्दों की याद में दिए जलाएगें सडक पे सोये भूखो की कविता गजल बनायेगें माफ़ करना ये लेखक हैं लूली लगड़ी आरजुओ के दहाड़े मार रोयेंगे वीरान सही ये रास्ता पर मेरी निगाह हैं झिलमिलाते तारो...

कविता