नवीनतम लेख/रचना



  • मज़दूर

    मज़दूर

    भगवान ने तन दिया , भगवान ने मन दिया साथ में दे दिया एक पेट, पेट देकर किया मज़बूर , इंसान बन गया मज़दूर, जो सचमुच इंसान है, जिसका आसरा भगवान है, वह बेचारा, रोज़ रोज़, दिन रात कड़ी मेहनत  करता है, अपना और अपने परिवार का पेट भरता है, मज़दूर तो मज़दूर है, कितना मज़बूर है, पर कुछ लोग यहाँ ‘मगरूर’ हैं, कैसे भी हो, चोरी से, बईमानी से, या किसी मज़बूर की कुर्बानी से, उन्हें तो बस अपना जेब भरना है, दूसरो का हक़ मार कर, खुदा को भुला कर, जो मन में आये, पैसे के लिए करना है. उठो , देश के मज़दूरों जागो, तकनीकी युग के साथ चलो, नई नै तकनीक सीखो, आपकी ताक़त देश की शक्ति है, आपकी मेहनत ही– सच्ची ईश्वर भक्ति है, उठो ,ईमानदारी से करो अपना कर्म, परिवार और देश की खातिर — यही है सच्चा धर्म, ईमानदारी और मेहनत की रोटी में- जो स्वाद आएगा– हराम, की कमाई , वाला वह सुख कभी ना पायेगा —जय प्रकाश भाटिया

  • “प्रेम …..”

    “प्रेम …..”

    रोज की तरह वही मेरा पुराना सवाल आखिर कितना प्रेम है तुम्हें मुझसे और तुम्हारा फिर उसी तरह चिढ़ाना जितना तुम्हें मुझसे है उससे थोड़ा सा ज्यादा ! वो थोड़ा सा ज्यादा कितना सुकून दे जाता...



  • बदलता हुआ समय

    बदलता हुआ समय

    लौट आई है वही खुशबू सांसोँ की महक चाय के प्यालो की साथ मेँ लौट आई है वही कहकहे सूने आंगन की कुछ नहीँ बदला न तुम ,न हम असल मेँ बदलता तो समय है दिन...

  • श्रमिक

    श्रमिक

    जागा श्रमिक अभाव की चादर पीछे कर चला अपने भाग्य से लड़ने डट कर रेशमी बिस्तर में सोने वालो, तुमने कभी सुबह उठ कर देखा है ?   साहस की ईंटों को चुनता हैं अरमानों के...


  • गीत – बसंत

    गीत – बसंत

    बसन्ती रूप निराला देख , मचाता पागल मनवा शोर । मोर के पंखों जैसी छटा , दिखाती सुंदर जग की भोर ।| हिमानी शीत गयी है बीत , बहे अब सुरभित मंद बयार मचाती तन-मन में...

राजनीति

कविता