गीत/नवगीत

कब अच्छे दिन आयेंगे

जिसको देखो पूछता है वो कब अच्छे दिन आएँगे कब हम घर में बैठकर अपने दूध-मलाई खाएँगे लेकिन हम ये भूल गए कि जबतक हम ना सुधरेंगे कैसे अपने वर्तमान हालातों से हम उबरेंगे मंज़िल ना आएगी चलके हमको चलना पड़ता है स्वर्ग में जाना है तो पहले खुद को मरना पड़ता है बात करो […]

इतिहास

क्या वेद आर्य-द्रविड़ युद्ध का वर्णन करते है?

वेदों के विषय में एक अन्य भ्रान्ति फैलाई जा रही रही है कि आर्य लोग विदेशी (संभवत मध्य एशिया) थे और वे भारत भूमि पर आक्रमणकारी के रूप में आये। यहाँ के मूल निवासी काले रंग के लोगों पर जो द्रविड़ (दास) थे और जिन्हें आर्यों ने दास और दस्युओं का नाम दिया था पर […]

कहानी

संस्मरण : लगन

मैं दोपहर में नहीं सोती, क्यों कि सोने के लिए रात काफी होती है! अगर कभी मैं दिन में सो जाऊं, तो घर में सभी को पता चल जाता है कि मेरी तबियत जरुर नासाज़ है!आज सर में थोडा दर्द था, रात ठीक से नींद भी नहीं आई थी तो सोचा जरा झपकी ले लूँ, […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

सूफी नृत्य से चलें एक रूहानी दुनिया में

सूफीमत से हर कोई परिचित है। परन्तु अधिकांश लोगों को इसके मर्म, उद्देश्य और सबसे महŸवपूर्ण और चैतन्य बोध प्राप्ति आदि का सम्भ्वतः पूर्ण ज्ञान न हो। सूफीमत में देखा जाए तो इस्लाम से इतर उसमें बौद्ध, इसाईमत, हिन्दुत्व, ईरानी, जर्थुस्त्रवाद के अंशों का सम्मिलन है। इस्लाम ने संगीत को और गाजे-बाजे आद को कभी […]

हाइकु/सेदोका

सेदोका

१) जब भी दर्द हद से गुज़रता रोना चाहता मन रो नहीं पाता ज़माने के डर से सिर्फ़ हँसी सजाता । २) परदेश में ठण्डी हवा का झोंका धीरे से लेता आए यादें पुरानी माँ का नर्म आँचल वही सुनी कहानी । ३) शहरी भीड़ सब कुछ मिलता बिखरा चमचम नहीं मिलता- तारों की छाँव […]

राजनीति

स्वार्थी राजनीति को साधने के लिए बहस

संसद में असहिष्णुता पर जोरदार बहस हुई। लेकिन यह बहस भी केवल खोदा पहाड़ और निकली चुहिया ही साबित हो रही है। बनावटी असहिष्णुता के नाम पर यह केवल भाजपा संघ और पीएम मोदी को झूठे और मनगढंत आरोपों के तहत घेरने और देश व जनता का कीमती समय बर्बाद करने की साजिश थी। असहिष्णुता […]

संस्मरण

मेरी कहानी 83

बहादर और लड्डा यानी बहादर का छोटा भाई हरमिंदर कभी कभी शनिवार या रविवार को आते ही रहते थे. क्यूंकि उस समय टेलीफून तो होते नहीं थे, इस लिए वोह अचानक ही आ जाते थे. मेरे लिए मुश्किल यह होती थी कि मैं एक रविवार काम पे जाता था और एक रविवार को छुटी होती […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

सहिष्णुता और द्रौपदी

शान्ति का प्रस्ताव लेकर श्रीकृष्ण हस्तिनापुर जाने के लिए तैयार हो गए थे। सिर्फ पाँच गाँवों के बदले शान्ति के लिए पाण्डवों ने स्वीकृति दे दी थी। द्रौपदी को यह स्वीकार नहीं था। १३ वर्षों से खुली केशराशि को हाथ में पकड़कर उसने श्रीकृष्ण को दिखाया। नेत्रों में जल भरकर वह बोली — “कमलनयन श्रीकृष्ण! […]

कविता

जूठन में पड़ी थाली की व्यथा

दो पाँच हजार की खाने की थाली आज खुद शरमा रही है देख हम मासूमो के हालात आज कितनाअकुला रही है बन के अमीरों की शान कितना इतराती थी महफिलों में सज कर अपनीशान बढाती थी सेकड़ो पकवानो से सजती अनगिनत स्वाद थे मेरे मुझे खाते खाते लोग लगा लेते थे कितने फेरे मध्यम वर्ग […]

कविता

साँसों का मिलन

तुम साँस लेती हो शायद मेरे लिए, मैं साँस लेता हूँ शायद तुम्हारे लिए, इन सांसों का मिलन ही तो — हमारा विश्वास है, और इसी विश्वास में– जीवन की हर आस है, यही विश्वास हमें देता है– सुख ,समृद्धि और शक्ति , इसी से उपजती है भावना और प्रेम भक्ति, सांसों की खुशबू से […]