कविता

~भ्रष्टाचार~

कौन नहीं है भ्रष्टाचारी जरा हमें भी बतलाओ स्वयं को नेक कहने वाले जरा अपने गिरेबान में झांक के आओ | भ्रष्टाचार है ऐसी बीमारी जो सभी को लगती है एक बारी कोई तो बताये हमें व्यक्ति ऐसा जिसने ना काम किया हो कभी ऐसा -तैसा | कभी ना कभी तो लिया है या फिर […]

कविता

बेटी तुम

  नव प्रभात की सूर्य किरण से, आलोकित घर का निखार हो। आँगन की मृदु महक माधुरी, बेटी तुम, सबका दुलार हो।   ब्रह्मा का उत्कृष्ट सृजन तुम। निर्मल,कोमल,सुंदर तन तुम। कर्म योगिनी,स्वत्व स्वामिनी, स्वजनों की स्नेहिल पुकार हो, बेटी तुम सबका दुलार हो!   खिली खिली खुशरंग हिना तुम। चंचल, चतुर, चारु-वदना तुम। मृगनयनी, […]

कविता

जब प्रेम संग – संग चला

अँधेरी राहें हुई उजली जब प्रेम संग – संग चला। जब मिले थे मैं – तुम पहली बार लाए थे प्रेम का नजराना बेला के गजरे – हार महका था तब प्यार कम्पित हाथों से गजरा जब तुमने मेरे केश कुंज में सजाया था तब उड़ी दिल की फुलकारी सुरभित हुई प्यार की फुलवारी और […]

गीत/नवगीत

गीत

शीतलता से रहित चांदनी ,सूरज करे तपन , धुंधला,धुंधला सा दीखता है मन का ये दर्पण ! प्रथम मिलन में कभी हुआ था ,दोनों में सम्बन्ध, किन्तु मोतियों ने तोडा है, माला से सम्बन्ध ! ये गुलाब के बागीचे ,अब नागफनी के वन ! धुंधला , धुंधला सा दीखता है, मन का ये दर्पण ! […]

कथा साहित्य कहानी

कथा दर्पण- ‘साइलेण्ट लव’

साइलेण्ट लव मुहब्बत नगर में एक अंसू अनजान रहता था. बड़ा दिल था उसका. जिससे भी मिलता बड़ी शिद्दत से मिलता. एक रोज़ वह बेवफ़ाई नगर में अपने किसी रिश्तेदार की शादी में जा पंहुचा. रिश्तेदारों में एक सनम बेवफ़ा उसे दिखलाई दी. किसी ज़माने में उसने उसको देखा था. तभी से वह केवल उसी […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म विज्ञान

ईश्वर ने यह सृष्टि क्यों बनाई?

ओ३म् हम पृथिवी पर पैदा हुए हैं व इस पर रहते हैं परन्तु हमें शायद यह नहीं पता कि इस पृथिवी सहित समूचे ब्रह्माण्ड को किसने व क्यों बनाया? इसे कब बनाया यह भी बहुत कम लोग जानते हैं। क्या यह जानना आवश्यक नहीं है? यदि ऐसा नहीं है तो फिर प्रत्येक व्यक्ति को इसको […]

कविता

फिर होगा सागर मंथन…कविता

फिर होगा सागर मंथन, तुम बस इक मजबूत ढाल बन जाओ | हर युग के रावण के संहार के लिए तुम एक मिसाल बन जाओ | फिर होगा सागर मंथन तुम बस इक मजबूत ढाल बन जाओ | छट जाएगा अब अँधेरा अब तो कण कण झल्ला उठा है, देखकर मानवता के गिरते स्तर को […]

कविता

आज …..

आज बैठ गयी कुछ नया लिखने , नए -नए यादो में , नए शब्द पिरोने , शायद कभी नही लिखी हो , मैं भी अजीब हूँ , नए शब्द को खोजते -खोजते , खुद ही कही खो जाती हूँ , आज पूरी कर दूंगी , जो लाइने छोड़ी थी अधूरी , लफ्जो के बीच जो […]

कविता

******निशाना *****

पल पल पालती है बंद पिंजरे में एक औरत अपनी महत्वाकाँक्षाओं की चिड़िया को, कभी धूप और खुले आसमान की हवा खाने को निकालती है उस चिड़िया को बाहर, फुदक कर चिड़िया ज्यूँ ही मुंडेर तक पहुचती है, कोई घाघ शिकारी बैठा होता है दम साध निशाना बांधे मारने उस चिड़िया को, जानता है वो […]

सामाजिक

लेख : कथनी-करनी

एक कटाक्ष यह भी .. यूं तो हम सब बुद्धिजीवी दूसरों को समझाने या दोष निकालने में तत्पर रहते हैं | मगर कभी जब बात अपने पर या अपनों पर आती है तो हम रस्म कहकर या परिवार वालों की खुशी के लिए उसी बात में शामिल भी हो जाते हैं |बात चाहे रस्मों रिवाज़ […]