नवीनतम लेख/रचना

  • यशोदानंदन-४८

    श्रीकृष्ण ने मुस्कुरा कर अपनी सहमति दे दी। सुदामा ने भांति-भांति के पुष्पों से दो अति सुन्दर मालायें बनाईं और श्रीकृष्ण-बलराम को अपने हाथों से सजाया। उसके घर में जितने पुष्प थे, उसने सबका उपयोग कर...


  • कविता और विज्ञान

    कविता और विज्ञान

    नीला सुंदर गगन यह विस्तृत कल्पना हुई पूर्ण कवि की, अरे , यहाँ कोई रंग कहाँ है? ये तो माया है’अपवर्तन’ की। अहा जरा इनमें तो झांको नायिका की भावपूर्ण आँखें कहाँ, अरे ये तो मानव...


  • मुक्तक (किस्मत)

    मुक्तक (किस्मत)

    मुक्तक (किस्मत) रोता नहीं है कोई भी किसी और के लिए सब अपनी अपनी किस्मत को ले लेकर खूब रोते हैं प्यार की दौलत को कभी छोटा न समझना तुम होते है बदनसीब ,जो पाकर इसे...





  • इंतज़ार 

    इंतज़ार 

    दिन गुजर गया इंतज़ार में उनके, कहीं रात भी न ढल जाये ! बहुत मल -मल के धोया चेहरे को, पर उनकी यादों के निशाँन न जायें! फ़िर तेरी गज़लों को पढने बेठे, लफ़्ज़ों से तेरे...