नवीनतम लेख/रचना

  • उपन्यास : देवल देवी (कड़ी १८)

    15. रानी का कायरतापूर्वक समर्पण एक दिन नृत्य महफिल से उठकर सुल्तान अपने हरम में गया। और बांदी से रानी कमलावती को बुलाने को कहा। घड़ी भर भीतर रानी कमलावती, सुल्तान के सामने उपस्थित हुई। सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी,...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    तुम मेरी सांसों में समाए से लगते हो फिर भी जाने क्यों मुझे पराए से लगते हो घुली हुई है आँखों में मेरी जो इक तस्वीर तुम उसी तस्वीर के हमसाये से लगते हो जो ख्वाबो...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    आग , पानी, आसमाँ, मिट्टी, हवाएं ले गया । वो मेरे जीने की सब संभावनाएं ले गया । बारिशें, बादल, समंदर, रेत, दरिया, चाँदनी । संगदिल मौसम लबों से प्राथ॔नाएं ले गया । दर्द, आँसू, धूप,...


  • लव जिहाद

    लव जिहाद

    तुम मांगती हो आज़ादी लव जिहाद में शिकार हो जाने की सभी धर्मो के समान होने की दुहाई देकर और वो पर क़तर देते है तुम्हारे तुम्हारा शिकार करने के बाद अपने धर्म के नाम पर।...

  • कविता : शांति दीप जलाना होगा

    कविता : शांति दीप जलाना होगा

    आज दिलों में अपने हमको, शान्ति दीप जलाना होगा, नफ़रत का संसार मिटाकर, प्यार उजाला लाना होगा। खेल चुके हैं खेल बहुत, अलगाववाद और आरक्षण का, ज्ञानवान- विद्वान बनाकर, विकसित राष्ट्र बनाना होगा। भ्रष्टाचार के जो...

  • रंगो मे बसी जिंदगी

    रंगो मे बसी जिंदगी

    “अरे बहू तुमने ये बेंरगी साङी क्यूं पहनी है ? यह रंग तुम पर जंचता ही नही. जाओ इसे बदल कर आओ।” “नही मांजी, सारे मुहल्ले वाले, रिश्तेदार बाते करते है इनको गुजरे अभी छ: महिने...

  • आज का आदमी

    आज का आदमी

    आँधियाँ भी नहीं बुझाती कभी चिरागों को इस तरह , आज इंसानियत को जिस तरह से मिटाता है आदमी, महासागर की लहरें भी नहीं उछलती ज्वार में इस तरह, अपनी दौलत के नशे में ,आज ज्यों...

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