नवीनतम लेख/रचना

  • प्रकाश पर्व फिर आया है

    प्रकाश पर्व फिर आया है

    कुछ दिन पूर्व रचित मधु गीत (बंगला – हिन्दी रूपान्तर के साथ, हिन्दी व उर्दू ) द्वारा भाव गंगा में डुबकी लगाइए: १. आलो आवार फिरिये एलो आलो आवार फिरिये एलो, दु:खेर बेला चलिये गेलो; सुखेर कली खुलिये...


  • नजरिया

    नजरिया

    मनीष मिश्रा “मणि ” कुछ इस तरह बीता वक्त से गुफ्तगू का दौर कहा डाला बहुत कुछ निकाली मन की भडास सारी वो खामोश सुनता रहा मेरे ताने उलाहने शिकायते मुस्कुरा भी लेता था बीच में...


  • नदी

    नदी

      आँसुओं से तर लगती है नदी रेत के नीचे बहती है एक और नदी वो विशाल वृक्ष कितना तन्हा है उम्मीदों के पक्षी रहते है वहीं मुझसे खुद को अलग न समझ मेरे ख्यालों से...

  • कली

    कली

      उसने कहा मेरे लिए भी लिखो ग़ज़ल समय को काफ़ी वक्त लगा ढलने में ग़ज़ल इस दरम्यान वह रूठ कर कहीं चली गयी दिल के आईने से न पाया पर मैं उसकी परछाई बदल कभी...

  • राष्ट्रीय पक्षी उल्लू

    किसी भी देश की एक पहचान होती है, उसके नागरिकों से। और नागरिकों की उनके गुणों से। इस आधार पर कह रहा हूँँ कि हमारा राष्ट्रीय पक्षी उल्लू होना चाहिए, मोर नहीं। माता लक्ष्मी की सवारी।...

  • दीप हूँ मैं

    दीप हूँ मैं

    दीप हूँ मैं मैं मनुज के खोज की पहली कहानी जगत के उत्थान की मैं हूँ निशानी बिखर जाऊँ तो प्रलय&अंगार हूँ मैं लोक में आलोक का सिंगार हूँ मैं विफल मन में सफलता का गीत...


  • कहानी : लौट आओ दिशा !

    कहानी : लौट आओ दिशा !

    “प्रभात….. प्रभात………….” माँ की आवाज तेज होती जा रही थी और प्रभात के कान पर जूँ तक नहीं रेंग रही थी। आज इस लड़के से बात करके रहूंगी, पता नहीं क्या समझता है अपने आप को । इधर...

कविता