नवीनतम लेख/रचना


  • नहीं  समेटी नहीं जाती पीर अब तो

    नहीं समेटी नहीं जाती पीर अब तो

    नहीं समेटी नहीं जातीपीर अब तोकागजो मेंहर्फ़ों में किस्सों में विचारों में मात्र यहाँ या और कही भी लिख देने भर से नहीं सुलझता ये जाला उलझन का ….. जबसे बदलने लगे हालात मुल्क के महफूज़ नहीं बेटियां...

  • जला आई हूँ मैं

    जला आई हूँ मैं

    जला आई हूँ मैंतुम्हारी रामायणजहाँ पूजा जा रहा थासीता को…बनाकर देवी-स्वरूपानहीं बनना था मुझे सीता नहीं देनी थी अग्नि-परीक्षा ना समाना था.. धरती की गोद में नहीं लेना था.. तमगा कोई पतिव्रता होने का ना भटकना...

  • तुम गए तो मेरी प्यास गई

    तुम गए तो मेरी प्यास गई

    तुम गए तो जैसे प्राण गए, मेरे जीवन की आस गई तर्षित थी मैं जन्मों से,. तुम गए तो मेरी प्यास गई जीवित तो…. अब भी हूँ मैं मैं हर्षित…. भी रह लेती हूँ तुम बिन चिंतन शून्य है पर मैं...

  • लघु कथा –    स्वार्थी

    लघु कथा – स्वार्थी

      दिवाकर नाथ अपनी पत्नी और इकलौते  बेटे राजेश के साथ एक शहर में रहता था। मुहल्ले  में  कोई  भी घटना होती , किसी पर भी कोई  भी मुसीबत आती तो दिवाकर नाथ उसे अनदेखा  करके,...





  • मेरी माँ ने

    मेरी माँ ने

    मेरी माँ ने झूठ बोल के आंसू छिपा लिया भूखी रह के भी, भरे पेट का बहाना बना लिया. सर पे उठा के बोझा जब थक गई थी वो इक घूंट पानी पीके अपना ग़म दबा...

कविता