कविता

बॉर्डर पर किसान

बॉर्डर पर पहुंचा किसान यह देखकर चौक गया हर इंसान। शक नहीं है उसे किसी भी बात पर लेकर रहेगा वह अपना हक हर हाल पर। सहारे की इस बार उसे जरूरत नहीं पीछे हटने की इस बार उसकी सोच नहीं। तैयारी उसकी पूरी है जीतना उसके लिए जरूरी है। दिल्ली अब घिर चुकी हैं […]

भाषा-साहित्य

मेरा भाई

  कदै भी पड्या मैं तनै ठाया भाई हर एक जिम्मा तनै निभाया भाई मै तो जिब कसूता ऐ डरया करदा साईकल पै पहली तनै चलाया भाई मै तो कतई धूल तेरे स्नेह का फूल नूये खिलेगा सच बताऊँ तेरे बरगा भाई नहीं मिलेगा कदै तै दिलखोल कै जिणियां सै किसे तै बी कोनी डरदा […]

कविता

जो पास है

जो पास है वो सिर्फ आज है भूत भविष्य तो बस मन का एक ख़्वाब हैं। आज मे ही जीना है तुम्हें कुछ और नहीं सोचना है तुम्हें। अभी के इस पल को जी भर के तुम जी लो। भूत भविष्य की चिंता को अब तुम्हें हैं छोडना। बाद में वरना तुम पछताओगे जब कुछ […]

कविता

कफस में कनेरी

जाल बिछाया छलिया अहेरी, कहां समझ पाई मैं नन्ही कनेरी? देकर मुझे अधम ने प्रलोभन, छीन लिया मेरा उन्मुक्त गगन। हो गई कफस में कैद, मां मैं ,झर – झर बहे मेरे नैन। ना भर सकती ,नभ में स्वच्छंद उड़ान, दफन हो गए ,क्षितिज के अरमान। कहते सुना,  पीली कनेरी सुन्दर गान, मां क्रंदन में  […]

कविता

अनिश्चितता  

आज मैं बड़े असमंजस में हूँ , सोचती हूँ क्या कहूँ, यही सोच रही हूँ कि हम अभावों को कैसे समझ पाते? कुछ प्रत्यक्ष – अप्रत्यक्ष रूप से, कभी अनमने मन से, कभी वास्तविकता में, हम यादों के झरोखों से झाँक आते! ऐसा प्रतीत होता मानो अनिश्चितता ही एक मात्र नियम है, सभी वस्तुओं का प्रारम्भ व अंत […]

कविता

हाथरस…

परिस्थिति वैसी की वैसी, जस की तस, दिल्ली हो, बेंगलुरु या हो #हाथरस.   #सपा, #बसपा, #कांग्रेस या हो #भाजपा, स्त्रियों की #सुरक्षा पर न इनका बस.   बदल गई सूरत दशकों में कितनी ही पर, स्त्रियाँ पहले की ही तरह अब भी बेबस.   दरिंदों को चौराहे पर गोली मारो, सह चुके बहुत #अत्याचार, […]

गीतिका/ग़ज़ल

नेताओं के दंश…

नेताओं के दंश, बड़े विध्वंसक हैं. आएंगे बनके रक्षक, पर भक्षक हैं. इनकी सिर्फ कथनी-करनी ही नहीं, ये मानव हैं, इसपर भी गहरा शक है. जांचे-परखें, इनकी बातों को पहले, स्वयं करें मूल्यांकन, अति आवश्यक है. स्वार्थ स्वयं का निहित है इनके धरने में, आपके सुख दुःख से न इनको मतलब है. इनको नहीं किसानों […]

कविता

मीडिया और हम

तटस्थ सूचना निष्पक्ष विश्लेषण समय वो पीछे छूट गया दायित्वों से वचनबद्ध था चौथा स्तंभ वो टूट गया । सनसनी शब्द के मतलब बदले खबरों के चैनल की बाढ़ विज्ञापन में उलझे दर्शक ढूंढ रहे हैं ‘ समाचार ‘ । मूल्य तिरोहित करता जाता समाज का नुमाइंदा है ये प्रतिनिधि है धन कुबेर का मर्यादा […]

कविता

बँटवारा

आज़ादी का हाथ थाम कर आया बटँवारा इस देश में। तहस नहस कर दिया सबकुछ जिसनें पूरे देश में। मज़हब के नाम पर काटने लगा अचानक इंसान ही इंसान को। क्योंकि बट चुका था यह देश उसी के नाम पर हिंदू ,मुस्लिम, सिख, ईसाई जो पहले थे जिगरी भाई । पर अब चुके थे सब […]

कविता

व्यतीत करना छोड़ दें

व्यतीत करना छोड़ दें जीवन जीना अब तू सीख ले । अपने जीवन काल में तू कर गुज़र कुछ ऐसा कि हिमालय भी झुक पड़े और बोले कि तुझ-सा नहीं देखा।। आपनी इच्छाओं का तू गला कभी मत घोटना। क्या पता वही तुझे तेरी मंजिल तक पहुंचा दे। अब छोटी – छोटी बातों में हँसना […]