कविता

छंद मुक्त रचना : सताती गर्मी

तपे जेठ दुपहरिया संझा गरम बयरिया। भोर ,शीतलता खोती रातें मुंह ढ़क के रोती। धरती का जलता सीना पशु पक्षियों का चैन छिना । बूंद बूंद को तरस रहे निस दिन नैना बरस रहे । सूरज अगन लगा रहा कानन उपवन जला रहा । हरित आंचल वसुधा का जला आई कहाँ से ये गरम बला। […]