कविता पद्य साहित्य

पता न चला!

हम साथ खेलते-खेलते कब बड़े हो गए, पता न चला, हम लड़ते झगड़ते कब समझदार बन गए, पता न चला, और हम हँसते- हँसते जीवन के प्रति कब गंभीर हो गए, पता न चला! जीवन के हर संघर्ष में तुमने साथ दिया, हर अभाव को अपनी मुस्कुराहट से दूर भगा दिया, इस संसार के चक्रव्यूह […]

गीतिका/ग़ज़ल पद्य साहित्य

मुस्कुराते रहो

प्यार के गीत गाते रहो । हर हाल मुस्कुराते रहो ॥ जीत हार से होकर परे । जश्न ए खुशी मनाते रहो ॥ छोड़ परेशानी जमाने की । तराने नये गुनगुनाते रहो ॥ गिरा दीवारें जात पात की । गिरों को गले से लगाते रहो ॥ बढ़ता चल,चलना ही जिंदगी । ठहरों को बात ये […]

लघुकथा

विरासत

विधायक प्रमिला सिंह अपने क्षेत्र के दौरे पर आई थीं। मंच पर से अपनी जनता को सम्बोधित  कर वह बोलीं। “आज बहुत दिनों के बाद अपने घर आई हूँ। पर इस बार अकेली नहीं आई हूँ। आपके बेटे और बहू को भी साथ लाई हूँ।” मंच पर बैठे उनके बेटे ने खड़े होकर सबका अभिवादन […]

लघुकथा

तसल्ली

नर्स ऑपरेशन से पहले कुछ दवाएं देने आई तो देखा कि मि. दत्त कुछ परेशान हैं। “घबराइए नहीं सर डॉ. खान माने हुए सर्जन हैं।” मि. दत्त को ऑपरेशन की चिंता नहीं थी। उनकी निगाहें दरवाज़े पर लगी थीं। तभी घर से कुछ आवश्यक सामान लेकर लौटी पत्नी के साथ ही उनके चेहरे पर मुस्कान […]

लघुकथा

कोच सर

मेहुल पिछले कुछ दिनों से प्रैक्टिस में ध्यान नहीं दे पा रहा था। इस बात से उसके कोच नाराज़ थे। आज उसके क्लब का मैच था। उसके टीम की स्थिति अच्छी नहीं थी। पर उसने अच्छी गेंदबाज़ी करके अपनी टीम को मैच जिता दिया। सब उसकी तारीफ कर रहे थे। पर मेहुल की निगाह अपने […]

लघुकथा

अंजान खतरा

एस. पी. चंदा सिंह ने इंस्पेक्टर मूलचंद से पूँछा। “अब तो तुम्हारी बेटी साल भर की होने वाली होगी।” “हाँ मैडम बहुत शरारती भी हो गई है। अपनी मासूम हरकतों से सबका मन मोह लेती है। सबका खिलौना बनी रहती है।” एस. पी. चंदा ने सोंचते हुए कहा। “वो तो मासूम है पर उसका खयाल […]

लघुकथा

आत्मिक सुख

विभूति बाबू के रिटायरमेंट को करीब छह महीने बीत गए थे। उनके कमरे में चारों तरफ साहित्यिक किताबें रखी थीं। वह कागज़ कलम लेकर कुछ लिख रहे थे। तभी उनके चचेरे भाई उनसे मिलने आए। “अभी तक तक कलम घिसने से जी नहीं भरा ?” अपने भाई के प्रश्न के जवाब में विभूति बाबू बोले। […]

लघुकथा

स्वागत

जीत के ढोल नगाड़े बजाते हुए वह लोग दरवाज़े पर आ गए। “बेदाग छुड़ा लाया तुम्हारे बेटे को। स्वागत करो इसका।” दरवाज़े पर थाली लिए खड़ी रुक्मणी ने अपने पति की आज्ञा का पालन करते हुए बेटे को तिलक लगाया। स्वागत के बाद वह अपने कमरे में आ गई। घुसते ही आदम कद आईने में […]

लघुकथा

ध्यानी बाबा

इधर कुछ दिनों से राम जानकी का छोटा सा मंदिर भक्तों के आकर्षण का केंद्र बना था। मंदिर में कहीं से एक बंदर आ गया था जो चौबीसों घंटे मंदिर की चौखट पर बैठा रहता था। देख कर ऐसा लगता था जैसे ध्यान में लीन हो। लोग के बीच वह ध्यानी बाबा के नाम से […]

लघुकथा

मसखरा

मसखरा स्टेज पर अजीबोगरीब हरकतें कर सबको हंसा रहा था। लोग मैजिक शो से अधिक शो के बीच में होने वाले मसखरे के खेल को पसंद करते थे। सब उसके खेल को देख कर लोटपोट हुए जा रहे थे। तभी मसखरे की नज़र सामने की पंक्ति में अपने पिता के साथ बैठी एक छोटी सी […]