गीतिका/ग़ज़ल

क्यों हर कोई परेशां है

क्यों हर कोई परेशां है दिल के पास है लेकिन निगाहों से जो ओझल है ख्बाबों में अक्सर वह हमारे पास आती है अपनों संग समय गुजरे इससे बेहतर क्या होगा कोई तन्हा रहना नहीं चाहें मजबूरी बनाती है किसी के हाल पर यारों,कौन कब आसूँ बहाता है बिना मेहनत के मंजिल कब किसके हाथ […]

गीतिका/ग़ज़ल

गज़ल (बचपन यार अच्छा था)

गज़ल (बचपन यार अच्छा था) जब हाथों हाथ लेते थे अपने भी पराये भी बचपन यार अच्छा था हँसता मुस्कराता था बारीकी जमाने की, समझने में उम्र गुज़री भोले भाले चेहरे में सयानापन समाता था मिलते हाथ हैं लेकिन दिल मिलते नहीं यारों मिलाकर हाथ, पीछे से मुझको मार जाता था सुना है आजकल कि […]

गीतिका/ग़ज़ल

सबकी ऐसे गुजर गयी

हिन्दू देखे, मुस्लिम देखे, इन्सां देख नहीं पाया मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे में, आते जाते उमर गयी अपना अपना राग लिये सब अपने अपने घेरे में हर इन्सां की एक कहानी, सबकी ऐसे गुजर गयी अपना हिस्सा पाने को ही सब घर में मशगूल दिखे इक कोने में माँ दुबकी थी, जब मेरी वहाँ नजर गयी […]

गीतिका/ग़ज़ल

रंग बदलती दुनिया देखी

  सपनीली दुनिया मेँ यारो सपने खूब मचलते देखे रंग बदलती दुनिया देखी , खुद को रंग बदलते देखा सुविधाभोगी को तो मैंने एक जगह पर जमते देख़ा भूखों और गरीबोँ को तो दर दर मैंने चलते देखा देखा हर मौसम में मैंने अपने बच्चों को कठिनाई में मैंने टॉमी डॉगी शेरू को, खाते देखा, पलते देखा पैसों की […]

गीतिका/ग़ज़ल

कंक्रीटों के जंगल

  इन कंक्रीटों के जंगल में नहीं लगता है मन अपना जमीं भी हो गगन भी हो ऐसा घर बनाते हैं ना ही रोशनी आये ना खुशबु ही बिखर पाये हालात देखकर घर की पक्षी भी लजाते हैं दीवारेँ ही दीवारें नजर आये घरों में क्यों पड़ोसी से मिले नजरें तो कैसे मुहँ बनाते हैं […]

गीतिका/ग़ज़ल

माँ का एक सा चेहरा

बदलते वक्त में मुझको दिखे बदले हुए चेहरे माँ का एक सा चेहरा , मेरे मन में पसर जाता नहीं देखा खुदा को है ना ईश्वर से मिला मैं हुँ मुझे माँ के ही चेहरे मेँ खुदा यारो नजर आता मुश्किल से निकल आता, करता याद जब माँ को माँ कितनी दूर हो फ़िर भी, […]

कविता

मेरे हमनसी मेरे दिलबर अपने प्यार का पता दे

मेरे हमनसी मेरे दिलबर अपने प्यार का पता दे तू दूर क्यों है हमसे इतना जरा पता दे तेरे प्यार के ही खातिर ,दुनियाँ बसायी मैनें तेरे प्यार को ही पाकर महफ़िल सजाई मैनें जितने भी गम थे मेरे उनको मैं भूलता था मेरी दिलरुबा मेरे दिलबर तुमको ही पूजता था मंज़ूर क्या खुदा को […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल (सपने खूब मचलते देखे)

सपनीली दुनियाँ मेँ यारो सपने खूब मचलते देखे रंग बदलती दूनियाँ देखी, खुद को रंग बदलते देखा सुविधाभोगी को तो मैंने एक जगह पर जमते देख़ा भूखों और गरीबोँ को तो दर दर मैंने चलते देखा देखा हर मौसम में मैंने अपने बच्चों को कठिनाई में मैंने टॉमी डॉगी शेरू को, खाते देखा, पलते देखा […]